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दमोह उप-चुनाव के नतीजे पर सबकी नजर

भोपाल, 30 अप्रैल (आईएएनएस)| मध्यप्रदेश में दमोह विधानसभा उपचुनाव के नतीजों पर सबकी नजर है, इसकी वजह कोरोना काल में हुआ चुनाव, मतदान का कम प्रतिशत और दलबदल करने वाले उम्मीदवार को लेकर जनता और भाजपा के एक धड़े के बीच असंतोष एक बड़ा कारण है।

उपचुनाव के लिए दमोह में 17 अप्रैल को मतदान हुआ था और मतदान का प्रतिशत बीते चुनाव के मुकाबले कहीं कम रहा था। यहां लगभग 60 फीसदी वोट पड़े इसमें शहरी इलाकों में जहां 53 फीसदी लोगों ने मतदान किया वहीं ग्रामीण इलाकों में मतदान का प्रतिशत 64 के आसपास रहा।

मतगणना 2 मई को होने वाली है और दोनों ही राजनीतिक दलों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं भाजपा से जहां उम्मीदवार राहुल लोधी हैं तो वहीं कांग्रेस की ओर से अजय टंडन मैदान में हैं।

उपचुनाव के दौरान एक बात साफ नजर आई थी कि जहां भाजपा ने राहुल लोधी को उम्मीदवार बनाया है उससे आमजन से लेकर पार्टी का एक धड़ा खासा नाराज था ,वही कांग्रेस यह उम्मीद लगाए रही कि इस बार मतदान का प्रतिशत ज्यादा रहेगा और शहरी इलाकों के साथ ग्रामीण इलाकों में भी कांग्रेस उम्मीदवार को भरपूर समर्थन मिलेगा।

भाजपा इस बात से वाकिफ थी कि उसे मतदाताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण रहा कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने स्वयं दमोह में कई दिनों तक डेरा डाल रखा, तो दूसरी ओर सरकार ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी और उसने गोपाल भार्गव, भूपेंद्र सिंह जैसे बड़े चेहरों के साथ अन्य नेताओं को भी चुनाव की कमान सौंपी।

राजनीति के जानकारों का मानना है की उपचुनाव में भाजपा सरकार के साथ संगठन की भी प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी, यही कारण है कि प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने चुनावी मैनेजमेंट को खुद अपने हाथ में रखा और तमाम उन असंतुष्ट लोगों को साधने की कोशिश की जो भाजपा के कभी वोटर रहे हैं, मगर इस बार भाजपा का साथ देने तैयार नहीं थे। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने भी पूरी ताकत लगा दी। कांग्रेस को इस बात का भरोसा रहा कि मतदाता उसके साथ होगा और दलबदल करने वाले को सबक सिखाएगा।

दमोह उपचुनाव में मतदान अपेक्षा के अनुरूप न होने का नतीजा है कि दोनों ही राजनीतिक दल पशोपेश में हैं, जहां इस बात की संभावना ज्यादा थी कि शहरी इलाके का मतदाता खुलकर सामने आएगा और वह दलबदल के खिलाफ नाराजगी दिखाएगा तो वैसा नहीं हुआ, वहीं भाजपा ने ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ बढ़ाने की हर संभव कोशिश की और उसकी नजर भी ग्रामीण मतदाताओं पर रही । ग्रामीण इलाकों में हुआ ज्यादा मतदान कहीं भाजपा को फायदा तो नहीं पहुंचा रहा यह बड़ा सवाल है।

राज्य में दमोह विधानसभा के उप-चुनाव से सरकार पर किसी तरह का असर नहीं पड़ने वाला, मगर इस नतीजे के सियासी तौर पर मायने जरुर होंगे। यहां कांग्रेस जीतती है तो यह माना जाएगा कि राज्य सरकार और दलबदलू को उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले को जनता ने नकार दिया, वहीं भाजपा की जीत से सत्ता और संगठन को संबल मिलेगा कि अभी एंटीइनकंवेसी नहीं है। इसके साथ ही आगामी समय में होने वाले नगरीय निकाय और पंचायत के चुनाव में कांग्रेस का भाजपा पर हमला करने का मौका ज्यादा नहीं मिलेगा।

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