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आईएमएफ ने भारत की 2021-22 की जीडीपी वृद्धि दर 9.5 फीसदी रखी, वैश्विक स्थान बरकरार

संयुक्त राष्ट्र, 13 अक्टूबर (आईएएनएस)| अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के मंगलवार को जारी अनुमानों के मुताबिक, भारत इस वित्तवर्ष में 9.5 फीसदी और अगले वित्तवर्ष में 8.5 फीसदी की वृद्धिदर के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा।

आईएमएफ के वल्र्ड इकोनॉमिक आउटलुक (हएड) ने भारत के लिए जुलाई में किए गए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के विकास के अनुमानों को रखा, जिसकी कोविड-पस्त अर्थव्यवस्था पिछले वित्तवर्ष में 7.3 प्रतिशत तक सिकुड़ गई थी।

जुलाई में, जब भारत कोविड-19 की दूसरी लहर की चपेट में था, आईएमएफ ने महामारी के पुनरुत्थान से पहले अप्रैल में किए गए 12.5 प्रतिशत के अपने पूवार्नुमान में 3 प्रतिशत की कटौती की थी।

भारत की जीडीपी वृद्धि के लिए हएड का दीर्घकालिक पूवार्नुमान 2026 में 6.1 प्रतिशत है।

डब्ल्यूईओ की तालिकाओं में, चीन ने इस वर्ष 8 प्रतिशत और अगले वर्ष के लिए 5.6 प्रतिशत के साथ भारत का अनुसरण किया – जुलाई में लगाए गए पूवार्नुमान से दोनों वर्षो के लिए 0.1 प्रतिशत की कमी रही।

ब्रिटेन इस वर्ष 6.8 प्रतिशत की वृद्धि के साथ दूसरे स्थान पर आया, उसके बाद फ्रांस 6.5 प्रतिशत और अमेरिका छह प्रतिशत के साथ आया।

वैश्विक अर्थव्यवस्था के 2021 में 5.9 प्रतिशत और 2022 में 4.9 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है – जुलाई के पूवार्नुमान की तुलना में 2021 के लिए 0.1 प्रतिशत कम।

डब्ल्यूईओ ने कहा, “2021 के लिए नीचे की ओर संशोधन उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के लिए गिरावट को दर्शाता है आंशिक रूप से आपूर्ति में व्यवधान के कारण और कम आय वाले विकासशील देशों के लिए, मुख्य रूप से बिगड़ती महामारी की गतिशीलता के कारण।”

आईएमएफ की मुख्य आर्थिक विशेषज्ञ गीता गोपीनाथ ने डब्ल्यूईओ को भेजे अपने प्रस्ताव में कहा, “वैश्विक सुधार जारी है, लेकिन महामारी की वजह से गति कमजोर हो गई है।”

उन्होंने कहा, “अत्यधिक पारगम्य डेल्टा वेरिएंट के कारण रिकॉर्ड किए गए वैश्विक कोविड-19 की मौत का आंकड़ा 50 लाख के करीब पहुंच गया है और स्वास्थ्य जोखिम लाजिमी है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के महत्वपूर्ण लिंक में महामारी का प्रकोप लंबे समय तक रहा है- अपेक्षा से अधिक आपूर्ति में व्यवधान, कई देशों में मुद्रास्फीति को और बढ़ावा दे रहा है।”

उन्होंने चेतावनी दी, “कुल मिलाकर, आर्थिक संभावनाओं के लिए जोखिम बढ़ गए हैं और नीतिगत व्यापार अधिक जटिल हो गए हैं।”

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