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June 29, 2022
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पंजाब में हिंसा की नये दौर ने दशकों पुराने जख्मों को कुरेदा

नयी दिल्ली, 5 जून (आईएएनएस)| वह 1988 का साल था और जगह थी- पंजाब का गुरदासपुर। आधी रात को घर के दरवाजे पर दी जाने वाली दस्तक, वहां के कई हिंदूू परिवारों के लिए बुरे सपने की तरह थी।

80 के दशक के शुरूआती समय में ही जनरल भिंडरांवाला और उसके समर्थक हिंदुओं को निशाना बनाने लगे थे। उन्होंने भिंडरांवाला की विचारधारा के मुखर आलोचक रहे दैनिक समाचारपत्र ‘पंजाब केसरी’ के प्रकाशक लाला जगत नारायण की हत्या कर दी थी।

ऐसा नहीं हैं कि पंजाब की धरती तब सिर्फ हिंदुओं के खून से ही लाल हुई बल्कि कई सिख भी इस हिंसा के शिकार हुए। खालिस्तानी आतंकवादियों ने 20,000 हिंदुओं और सिखों को मौत के घाट उतारा।

साल 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पंजाब का माहौल और बिगड़ गया। जुलाई 1987 में खालिस्तानी आतंकवादियों ने हरियाणा में बस पर हमला करके 34 हिंदुओं तथा पंजाब में भी बस पर हमला करके 38 हिंदुओं की हत्या कर दी।

पंजाब में जब आतकंवाद चरम पर था, तब वहां हिंदुओं और सिखों के बीच ऐसी खाई बनने लगी कि कई हिंदू वहां से पलायन करने पर मजबूर हो गए। ये हिंदू वो थे, जिन्होंने सिखों के साथ ही देश के विभाजन का दंश झेला था।

पंजाब में जो हिंसा एक विचारधार की लड़ाई के रूप में उभरी थी, उसने जल्द ही वसूली, डकैती और निर्दोषों की हत्याओं का रूप अख्तियार कर लिया।

विभाजन के कारण रावलपिंडी से उजड़ने के बाद गुरदासपुर में अपना आशियाना बना चुकी सरोजिनी भारद्वाज के लिए हिंसा का वह दौर कभी न भूलने वाली यादें बन चुका हैं।

सरोजिनी को अधिकतर बातें याद नहीं रहतीं। वह भूल जाती हैं कि उन्होंने कब खाना खाया, उनके रिश्तेदारों के क्या नाम हैं लेकिन उनके दिमाग में गुरदासपुर की घटनायें अब भी ताजी हैं। उनका परिवार भी पलायन करने वालों में शामिल था और अब वे करनाल में रहते हैं।

सरोजिनी ने कहा,” उस वक्त अलग सा तनाव हावी था। ऐसा नहीं था कि आतंकवादियों ने सिख परिवार को बख्शा था लेकिन हिंदू परिवार के लिए बात अलग थी। हिंदू परिवार की उपस्थिति वहां लोगों को बर्दाश्त नहीं थी। हिंदुओं ने सिखों की दुकानों पर जाना बंद कर दिया था और सिखों ने हिंदुओं के। हर वक्त मुझे विभाजन की याद दिलाता था। जमीन का बंटवारा बाद में होता है। उससे पहले आपसी संबंध टूटते हैं। मैंने अपने बेटे को भी कहा था कि वह बाहर जाते समय पगड़ी पहन कर जाए।”

उन्होंने कहा, ”बड़ी घटनायें आपको तोड़ती नहीं है क्योंकि उसका झटका आपको दुख से बचा लेता है लेकिन छोटी-छोटी बातें लगातार तकलीफ देती हैं। हमने जब गुरदासपुर छोड़ने का मन बना लिया तो हमारे पड़ोसी हमारे घर आये। उन्होंने कहा कि हम न जाएं लेकिन साथ ही यह पूछा कि हम अपना घर कितने में बेचना चाहते हैं।”

सरोजिनी के बेटे आकाश भारद्वाज ने बताया कि वह काम से या रिश्तेदारों से मिलने बाद में गुरदासपुर गये हैं। आकाश ने बताया कि उन्हें वहां जाने पर तकलीफ नहीं होती बल्कि गुस्सा आता है और यह गुस्सा किसी एक पर नहीं आता।

सरोजिनी का कहना है कि नई पीढ़ी ने अपनी पुरानी पीढ़ी के तर्जुबे से कुछ नहीं सीखा है।

ऑपरेशन ब्लू स्टार और इंदिरा गांधी के हत्या का साल 1984 सिखों के लिए दर्दनाक यादें लाने वाला रहा है। दिल्ली में उस वक्त रहने वाले परमवीर सिंह को अपने परिवार के साथ पंजाब के राजपुरा में पलायन करना पड़ा था। परमवीर सिंह पेपर आइटम के डीलर थे।

उन्होंने कहा कि उनके परिवार का कोई सदस्य हिंसा का शिकार नहीं हुआ था लेकिन सिखों के साथ हुई घटनाओं ने उन्हें भयभीत कर दिया।

परमवीर सिंह का कहना है कि राजपुरा जैसे छोटे शहर में बसने से उन्हें शुरूआत में सुरक्षा महसूस हुई थी लेकिन सिखों को आजाद करने के नाम पर चली मुहिम तालिबानी फरमान जारी करने वाली बन गई। हथियारों की सहज उपलब्धता के कारण सामाजिक और कानून व्यवस्था की समस्यायें खड़ी होने लगीं। इससे कारोबार पर बुरा असर पड़ा।

परमवीर सिंह जब पंजाब में लाइसेंसी हथियारों की बाढ़, गायकों द्वारा गन कल्चर को बढ़ावा देने पर चर्चा करते हैं तो अचानक ही उनका पोता सरबजीत सिंह भी बातचीत में दिलचस्पी लेने लगता है।

सरबजीत सिंह का मानना है कि सिद्धू मूसेवाला युवाओं की बात करता था। उनके अनुसार, पंजाबी गायक युवाओं के गुस्से को अपनी आवाज देकर बयां करते हैं।

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