जबलपुर। शहर में डिजिटल अरैस्ट का एक और सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसमें सायबर ठगों ने एक रिटायर्ड शासकीय कर्मचारी को पूरे 5 दिनों तक डिजिटल हाउस अरैस्ट में रखकर 32 लाख रुपये की ठगी कर ली। जागरूकता के तमाम प्रयासों के बावजूद डिजिटल अरैस्ट जैसे नए पैतरे लगातार लोगों को शिकार बना रहे हैं। इस बार मामला और भी चौंकाने वाला इसलिए है क्योंकि ठगों ने अंत में पीड़ित को खुलेआम कह दिया—”हम ठग हैं, जो बिगाड़ सकते हो बिगाड़ लो!”
यह पूरा मामला जबलपुर के नेपियर टाउन क्षेत्र में रहने वाले अविनाश चंद्र दीवान का है, जो अपनी बीमार पत्नी के साथ रहते हैं। 1 दिसंबर की दोपहर 2:30 बजे उन्हें एक व्हॉट्सऐप कॉल आया। कॉल करने वालों ने खुद को एटीएस पुणे के अधिकारी बताया और दावा किया कि एक आतंकी अफज़ल पकड़ा गया है, जिसके पास उनके आधार नंबर से जुड़े बैंक खातों के ट्रांजेक्शन का रिकॉर्ड मिला है।
ठगों ने दीवान को बताया कि उनके खाते से टैरेर फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग जुड़ी हुई है, और जांच ईडी कर रही है। लगातार डराने-धमकाने के बाद ठगों ने उन्हें डिजिटल अरैस्ट कर लिया—जो वास्तविक कानून में कहीं अस्तित्व ही नहीं रखता।
1 दिसंबर से 5 दिसंबर तक रोज़ 8 से 9 घंटे दीवान का वॉट्सऐप वीडियो कॉल चालू रखवाया गया। ठगों ने कहा कि जांच के लिए उन्हें अपनी बैंक राशि बताए गए खातों में ट्रांसफर करनी होगी, जो जांच पूरी होने के बाद वापस कर दी जाएगी।
झांसा मजबूत दिखाने के लिए सायबर ठगों ने आरबीआई के फर्जी लेटर भी भेजे।
दीवान ने डर और भ्रम के चलते 1 से 5 दिसंबर के बीच कुल 32 लाख रुपये विभिन्न खातों में ट्रांसफर कर दिए।
इधर, दीवान के बेटे को जब अपने पिता की मानसिक स्थिति पर संदेह हुआ तो वह जबलपुर लौटे। बात करने पर ठगी का खुलासा हुआ। इसके बाद पिता-पुत्र सीधे एसपी ऑफिस पहुंचे। वहां भी ठगों के व्हॉट्सऐप कॉल आते रहे।
पीड़ित के बेटे के अनुसार, ठगों ने आखिरी कॉल में धमकी देते हुए कहा—
“हम ठग हैं, हमारा काम हो चुका… अब तुम जो बिगाड़ सकते हो बिगाड़ लो, लेकिन अपने पिता का ख्याल रखना!”
मामले की शिकायत मदन महल थाने में दर्ज की गई है। थाना प्रभारी संगीता सिंह के अनुसार, पुलिस ने पूरा घटनाक्रम समझने के बाद मामला सायबर सेल को सौंप दिया है और जांच शुरू कर दी है।
अब पुलिस डिजिटल अरैस्ट गिरोह तक पहुंचने के लिए तकनीकी विश्लेषण, आईपी ट्रैकिंग और बैंक खातों की जांच कर रही है। ठगों का आखिरी कॉल इस बात का संकेत है कि वे खुद को पूरी तरह सुरक्षित मानकर काम करते हैं—लेकिन अब यह देखना होगा कि पुलिस इस चैलेंजिंग केस में उन्हें कब तक पकड़ पाती है।
इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि डिजिटल अरैस्ट, वीडियो कॉल दबाव, और आतंकवाद का डर—सायबर ठगों के नए हथियार बन चुके हैं, और आम नागरिकों को इससे बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।


