April 8, 2026
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मंथन: गंगा चरण मिश्र | अविनाश दीवान | ठग ने कहा ‘पापा’ और लूट ली जिंदगी भर की कमाई, बुजुर्ग की रूह कंपा देने वाली कहानी

मंथन: गंगा चरण मिश्र | अविनाश दीवान | ठग ने कहा ‘पापा’ और लूट ली जिंदगी भर की कमाई, बुजुर्ग की रूह कंपा देने वाली कहानी

साइबर अपराध की दुनिया अब केवल ओटीपी (OTP) मांगने या लॉटरी का लालच देने तक सीमित नहीं रही। इसका नया और बेहद खौफनाक चेहरा है- ‘डिजिटल अरेस्ट’। जबलपुर के 76 वर्षीय बुजुर्ग अविनाश चंद्र दीवान के साथ जो हुआ, वह केवल ठगी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक आतंकवाद है। यह घटना हमारे समाज की सुरक्षा व्यवस्था और डिजिटल साक्षरता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

भय और मनोविज्ञान का खेल इस घटना की पटकथा किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं थी, लेकिन इसका दर्द वास्तविक है। एक बुजुर्ग दम्पति, जो पहले से ही सड़क दुर्घटना और बीमारी से जूझ रहे थे, उन्हें शिकार बनाया गया। अपराधी ने पुलिस या जांच एजेंसी का डर दिखाकर उन्हें घर की चारदीवारी में ही कैद कर दिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अपराधी ने केवल डर का ही नहीं, बल्कि ‘सम्मान’ और ‘रिश्ते’ का भी नाटक किया। पीड़ित को ‘पापा’ और उनकी बीमार पत्नी को ‘मां’ कहना, “जय हिन्द” के उद्घोष के साथ बात करना—ये सब उस विश्वास को जीतने के हथकंडे थे, जिससे पीड़ित अपने ही बच्चों से कट जाए।

सिस्टम को खुली चुनौती ठगों का दुस्साहस देखिए कि वे नकली सुप्रीम कोर्ट और आरबीआई के लेटर हेड का इस्तेमाल करते हैं। पीड़ित को कैमरे पर 24 घंटे निगरानी में रखते हैं। हद तो तब हो गई जब साइबर सेल में बैठे पुलिस अधिकारियों के सामने ठग ने फोन पर चुनौती दी— “हमने जो करना था कर लिया, अब आप जो कर सकते हो कर लो।” यह घटना दर्शाती है कि हमारा साइबर सुरक्षा तंत्र इन अपराधियों के आगे कितना बेबस नजर आता है। भारत में 2024-2025 में 22,000 करोड़ रुपये की ठगी का आंकड़ा यह बताता है कि यह एक समानांतर अर्थव्यवस्था बन चुकी है।

जागरूकता ही बचाव है अविनाश जी की 36 साल की जमा पूंजी (करीब 30 लाख रुपये) 5 दिनों में साफ हो गई। वे आत्महत्या करने तक की स्थिति में पहुँच गए थे। गनीमत रही कि उनके बच्चों और भतीजों की सतर्कता ने उनकी जान बचा ली। लेकिन हर कोई इतना भाग्यशाली नहीं होता।

हमें यह समझना होगा कि कोई भी जांच एजेंसी—चाहे वह सीबीआई हो, ईडी हो या पुलिस—कभी भी वीडियो कॉल पर पूछताछ करके पैसे ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती। ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई कानून भारत में नहीं है।

यह समय है कि हम अपने घर के बुजुर्गों से बात करें। उन्हें तकनीक के इस काले चेहरे से अवगत कराएं। अविनाश जी का दर्द और उनके आंसू हमें चेतावनी दे रहे हैं कि अगर हम आज नहीं जागे, तो कल हमारी स्क्रीन पर भी कोई अनजान चेहरा हमें ‘डिजिटल कैदी’ बना सकता है।

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