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April 10, 2026
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राष्ट्रीय

साधन नहीं संकल्प रचता है इतिहास, यादों में नोबेल विजेता हर गोबिंद खुराना

नई दिल्ली, 8 जनवरी। एक छोटा सा गांव… जहां साक्षरता अपवाद थी और संसाधन न के बराबर थे, वहां से एक ऐसी वैज्ञानिक यात्रा शुरू हुई जिसने आगे चलकर जीवन के सबसे गूढ़ रहस्यों, जेनेटिक कोड की व्याख्या की दिशा तय की। साल 2011 में 9 नवंबर को दुनिया ने वैज्ञानिक हर गोबिंद खुराना को खो दिया, लेकिन उनका जीवन आज भी इस सवाल का जवाब देता है कि साधन नहीं, संकल्प इतिहास रचता है। 9 जनवरी 1922 को पंजाब प्रांत के रायपुर गांव (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मे हर गोबिंद खुराना ऐसे परिवार में पले-बढ़े, जहां शिक्षा ही सबसे बड़ी पूंजी थी।

उनके पिता ब्रिटिश शासन में पटवारी थे। गरीबी के बावजूद बच्चों की पढ़ाई के प्रति उनका समर्पण अडिग था। लगभग सौ लोगों की आबादी वाले उस गांव में खुराना का परिवार व्यावहारिक रूप से एकमात्र साक्षर परिवार था। मुल्तान के डीएवी हाई स्कूल से शुरू हुई उनकी शिक्षा यात्रा लाहौर स्थित पंजाब विश्वविद्यालय तक पहुंची, जहां उन्होंने एमएससी की डिग्री प्राप्त की। इस दौर में शिक्षक रतन लाल और पर्यवेक्षक महान सिंह का प्रभाव उनके शैक्षणिक संस्कारों में गहराई से उतरा। 1945 में भारत सरकार की फैलोशिप ने उन्हें इंग्लैंड पहुंचाया। लिवरपूल विश्वविद्यालय में पीएचडी के दौरान रोजर जेएस बीयर ने न केवल उनके शोध का मार्गदर्शन किया, बल्कि एक तरह से उनके नए संसार की देखरेख भी की। यहीं से खुराना पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति से परिचित हुए। 1948-49 में ज्यूरिख की ईडगेनॉस्चे टेक्निशे होचशूले में प्रोफेसर व्लादिमीर प्रेलोग के साथ बिताया गया पोस्ट डॉक्टोरल वर्ष खुराना के वैज्ञानिक दर्शन को आकार देने वाला साबित हुआ।

विज्ञान, कार्य और प्रयास को देखने का उनका नजरिया यहीं परिपक्व हुआ। 1949 में भारत में कुछ समय बिताने के बाद वे फिर इंग्लैंड लौटे और कैम्ब्रिज में डॉ. जीडब्ल्यू केनर तथा प्रोफेसर एआर टॉड के साथ 1950 से 1952 तक काम किया। इसी निर्णायक प्रवास में प्रोटीन और न्यूक्लिक एसिड, दोनों के प्रति उनकी रुचि विकसित हुई। 1952 में डॉ. गॉर्डन एम श्रुम के नौकरी प्रस्ताव ने उन्हें वैंकूवर पहुंचा दिया। सीमित सुविधाओं के बावजूद शोध की पूर्ण स्वतंत्रता ही वह माहौल था, जहां खुराना और उनके सहयोगियों ने जैविक रूप से महत्वपूर्ण फॉस्फेट एस्टर और न्यूक्लिक एसिड पर काम शुरू किया। डॉ. जैक कैंपबेल की वैज्ञानिक सलाह और डॉ. गॉर्डन एम टेनर जैसे समर्पित सहयोगियों ने इस समूह को बौद्धिक और मानवीय दोनों स्तरों पर समृद्ध किया।

1960 में वे विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय के एंजाइम अनुसंधान संस्थान से जुड़े और अमेरिकी नागरिक बने। 1968 में प्रोफेसर मार्शल निरेनबर्ग और प्रोफेसर रॉबर्ट हॉली के साथ उन्हें चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला। यह उपलब्धि उन्हें जेनेटिक कोड की व्याख्या और प्रोटीन संश्लेषण में उसकी भूमिका के लिए मिली। 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। 1970 के पतझड़ से वे मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान के अल्फ्रेड पी स्लोअन प्रोफेसर रहे। व्यक्तिगत जीवन में 1952 में स्विस मूल की एस्थर एलिजाबेथ सिबलर से विवाह ने खुराना को स्थिरता दी। ऐसे समय में, जब वे जन्म देश से वर्षों दूर रहकर हर जगह खुद को पराया महसूस करते थे। उनके तीन बच्चे, जूलिया एलिजाबेथ, एमिली ऐनी और डेव रॉय, उनकी जीवन यात्रा के साक्षी बने।

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