वसई की हवाओं में बसंत की खुशबू है, टेसू के फूल खिल रहे हैं और प्रकृति अपने सबसे सुंदर स्वरूप में है। लेकिन मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों से जो ‘खुलासा’ सामने आया है, उसने लोकतंत्र के इस बसंत को भ्रष्टाचार की कालिख से धुल दिया है। 21 जनवरी 2026 की वह तारीख प्रदेश के इतिहास में एक ‘काले अध्याय’ के रूप में दर्ज हो गई है, जब मुख्य सचिव अनुराग जैन ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान वह कह दिया, जिसे अब तक सिर्फ दबी जुबानों में कहा जाता था।
कड़वा सच और मौन सहमति मुख्य सचिव का यह बयान कि “मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मानते हैं कि प्रदेश का कोई भी कलेक्टर बिना पैसे लिए काम नहीं करता,” किसी बड़े खुलासे से कम नहीं है। लेकिन इससे भी ज्यादा डरावना दृश्य वह था, जब स्क्रीन पर मौजूद दर्जनों कलेक्टर्स और पुलिस अधिकारियों में से एक ने भी इस अपमानजनक टिप्पणी का विरोध करने का साहस नहीं दिखाया। यह चुप्पी क्या है? क्या यह इस व्यवस्था का हिस्सा होने की ‘मौन स्वीकृति’ है?
नारों की हकीकत और भ्रष्टाचार का पहिया कभी “भय, भूख और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार” का वादा करने वाली विचारधारा आज खुद कटघरे में खड़ी नजर आती है। जब प्रशासनिक पदों की ‘बोली’ लगने लगे, तो ईमानदारी की उम्मीद बेमानी हो जाती है। यदि कलेक्टर और एसपी जैसे पदों के लिए ‘अच्छे जिलों’ की परिभाषा उनकी ‘कमाई की क्षमता’ से तय होने लगे, तो फिर वह अधिकारी अपनी ‘पूंजी’ वसूलने के लिए आम जनता का ही गला घोंटेगा। अशोकनगर के पूर्व कलेक्टर आदित्य सिंह पर लगे ₹3 करोड़ की मांग के आरोप इसी सड़ी हुई व्यवस्था का एक छोटा सा हिस्सा मात्र हैं।
जड़ से ऊपर तक फैलता कैंसर भ्रष्टाचार अब सिर्फ पटवारी या बाबू तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह ऊपर से नीचे की ओर बहने वाली एक धारा बन चुका है। चुनाव लड़ने की बढ़ती लागत ने राजनीति को एक व्यापार बना दिया है। करोड़ों रुपये खर्च कर चुनाव जीतने वाला जनप्रतिधि और लाखों-करोड़ देकर मलाईदार जिला पाने वाला अधिकारी, दोनों का लक्ष्य जनसेवा नहीं, बल्कि ‘चढ़ोतरी’ (वसूली) रह गया है।
आम आदमी की लाचारी राजस्व विभाग में नामांतरण और खसरे के लिए सालों-साल ‘जन सुनवाई’ के चक्कर काटने वाला गरीब आदमी इस तंत्र की सबसे बड़ी बलि है। जब भू-माफिया और बाहुबली पैसे के दम पर रिकॉर्ड बदलवा लेते हैं, तो गरीब की जमीन और उसकी उम्मीद दोनों ही कुचल दी जाती हैं।
अगर इस प्रशासनिक अराजकता को समय रहते नहीं रोका गया, तो मध्य प्रदेश को ‘अगला यूपी-बिहार’ (अराजकता के संदर्भ में) बनने से कोई नहीं रोक पाएगा। मुख्यमंत्री की नाराजगी वाजिब हो सकती है, लेकिन समाधान सिर्फ नाराजगी जताने में नहीं, बल्कि इस तंत्र की सफाई करने में है। वरना “राम नाम की लूट” के इस युग में आम जनता सिर्फ पछताती रह जाएगी।


