शिक्षा का काम सवाल पैदा करना है, डर पैदा करना नहीं। विश्वविद्यालय विचारों के टकराव की जगह होते हैं, संदेह और निगरानी की प्रयोगशाला नहीं। लेकिन यूजीसी के नए समता के संवर्धन से संबंधित विनियम, 2026 इसी बुनियादी सोच को चुनौती देते दिखाई देते हैं। भेदभाव खत्म करने के नाम पर लाए गए ये नियम एक ऐसी व्यवस्था गढ़ते हैं, जहां समानता से ज़्यादा आशंका है और न्याय से ज़्यादा भय।गणतंत्र यात्रा के 77 वर्ष पूरे हो चुके हैं। दो दशक बाद देश स्वतंत्रता के सौ वर्ष मनाने जा रहा होगा। इसके बावजूद यदि शिक्षा में समानता आज भी अधूरा लक्ष्य है, तो यह किसी एक वर्ग की नहीं, पूरी राजनीतिक और नीतिगत व्यवस्था की सामूहिक विफलता है। सवाल यह नहीं है कि भेदभाव खत्म होना चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या राज्य की नाकामी की कीमत एक बार फिर कुछ चुनिंदा वर्गों को चुकानी पड़ेगी।यूजीसी का तर्क है कि ये नियम वंचित वर्गों को सुरक्षा देने के लिए हैं। इरादों पर बहस हो सकती है, लेकिन संरचना पर सवाल ज़रूरी है। जब कोई व्यवस्था कुछ को जन्मजात पीड़ित और कुछ को जन्मजात दोषी मानकर चलने लगे, तो वह न्याय नहीं रह जाती, वह पूर्वाग्रह बन जाती है। इक्विटी कमेटी, इक्विटी स्क्वॉड, हेल्पलाइन और एम्बेसडर जैसे प्रावधान न्याय की गारंटी नहीं देते, बल्कि स्थायी निगरानी का संकेत देते हैं।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के लिए कोई स्पष्ट दंड नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि आरोप ही सज़ा बन सकता है। कैंपस में विचार की आज़ादी की जगह डर का माहौल बनने का खतरा है, जहां छात्र और शिक्षक बोलने से पहले यह सोचेंगे कि कहीं उनकी बात किसी शिकायत में न बदल जाए।सामान्य या अनारक्षित वर्ग के छात्रों का विरोध केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है। यह उस असंतुलन की ओर इशारा करता है, जो इन नियमों की आत्मा में मौजूद है। जब निर्णय लेने वाली संस्थागत समितियों में कुछ वर्गों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य हो, लेकिन समानता के नाम पर सामान्य वर्ग को बाहर रखा जाए, तो यह इक्विटी नहीं, बल्कि चयनित न्याय है।इन नियमों ने विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर भी सीधा प्रहार किया है। 24 घंटे में बैठक, 15 दिन में रिपोर्ट और 7 दिन में कार्रवाई जैसी समय-सीमाएं शिक्षा सुधार कम और प्रशासनिक दंड व्यवस्था ज़्यादा लगती हैं। अनुदान रोकने और डिग्री पर रोक जैसे अधिकार यूजीसी को नियामक से आगे बढ़ाकर नियंत्रक बना देते हैं। सवाल यह है कि क्या विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र रहेंगे या आदेश पालन की इकाइयां बनकर रह जाएंगे।यदि स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी सरकारें यह मानती हैं कि समाज से भेदभाव खत्म नहीं किया जा सका, तो यह आत्ममंथन का विषय होना चाहिए, न कि नए नियमों के जरिए सामाजिक इंजीनियरिंग का प्रयोग। जाति के आधार पर समाधान खोजने की राजनीति ने समाज को जोड़ा नहीं, बल्कि उसे और विभाजित किया है।आखिर कब तक समानता को काग़ज़ों में खोजा जाएगा और असमानता को ज़मीन पर बढ़ावा दिया जाएगा। कब तक एक ही वर्ग से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह हर प्रयोग की कीमत चुपचाप चुकाए। और कब तक न्याय की भाषा में डर को वैध बनाया जाता रहेगा।सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती और सड़कों पर उतरते छात्र साफ संकेत दे रहे हैं कि भरोसा टूट चुका है। सरकार का यह कहना कि दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा, कोई ठोस आश्वासन नहीं, बल्कि एक अधूरा वाक्य है। असली सवाल यह है कि दुरुपयोग रोकेगा कौन और जवाबदेही किसकी होगी।समानता आदेश से नहीं, सहमति से आती है। न्याय निगरानी से नहीं, विश्वास से फलता है। जब तक नीतियां सभी वर्गों को समान सुरक्षा और समान जिम्मेदारी नहीं देतीं, तब तक ऐसे नियम समाज को जोड़ने के बजाय उसे और कठोर रेखाओं में बांटते रहेंगे। यूजीसी के लिए यह वक्त विरोध को दबाने का नहीं, उसे समझने का है। क्योंकि इतिहास गवाह है, डर के दम पर थोपी गई समानता कभी न्याय नहीं बन पाती।


