जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में गैर-शिक्षण कर्मचारी संघ के चुनाव को लेकर एक बार फिर विवाद गहराता नजर आ रहा है। चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही मतदाता सूची पर हस्ताक्षर और वार्षिक आय-व्यय के लेखा-जोखा को लेकर उठे विवाद ने पूरे मामले को उलझा दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कर्मचारी संघ अब दो अलग-अलग गुटों में बंटता दिखाई दे रहा है और चुनाव की प्रक्रिया फिलहाल अनिश्चितता के दौर में पहुंच गई है।
दरअसल, विश्वविद्यालय में गैर-शिक्षण कर्मचारी संघ का कार्यकाल समाप्त होने के बाद नई कार्यकारिणी के गठन के लिए चुनाव की तैयारी चल रही थी। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति किए जाने के बाद यह उम्मीद जताई जा रही थी कि जल्द ही चुनाव कार्यक्रम की अधिसूचना जारी कर दी जाएगी और नियमानुसार मतदान की प्रक्रिया पूरी कराई जाएगी।
मतदाता सूची पर हस्ताक्षर को लेकर शुरू हुआ विवाद
जानकारी के अनुसार कर्मचारी संघ के दो उपाध्यक्ष और महासचिव ने मिलकर संघ की मतदाता सूची तैयार कर ली थी। इस सूची को अंतिम रूप देकर निर्वाचन अधिकारी को सौंपे जाने की तैयारी भी की जा रही थी। लेकिन इसी दौरान संघ के अध्यक्ष वीरेंद्र पटेल ने मतदाता सूची पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया।
अध्यक्ष का कहना है कि मतदाता सूची पर हस्ताक्षर करने से पहले संघ के पिछले एक वर्ष के आय-व्यय का पूरा विवरण प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक जब तक संघ के वित्तीय लेन-देन का स्पष्ट लेखा-जोखा सामने नहीं आता, तब तक चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा। उन्होंने महासचिव से वार्षिक वित्तीय रिपोर्ट प्रस्तुत करने की मांग भी की है।
विरोधी गुट ने उठाए सवाल
दूसरी ओर संघ के दूसरे गुट ने इस मांग को चुनाव प्रक्रिया में देरी कराने की रणनीति बताया है। विरोधी गुट का कहना है कि संघ का बैंक खाता अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष के संयुक्त हस्ताक्षर से संचालित होता है। ऐसे में यदि वित्तीय लेन-देन को लेकर कोई शंका थी तो उसे पहले ही स्पष्ट किया जा सकता था।
विरोधी गुट के पदाधिकारियों का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के ठीक पहले लेखा-जोखा का मुद्दा उठाना संदेह पैदा करता है और इससे यह आशंका भी जताई जा रही है कि चुनाव कार्यक्रम को टालने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि संघ के नियमों के अनुसार समय पर चुनाव कराना आवश्यक है, इसलिए अनावश्यक विवाद पैदा कर प्रक्रिया को रोकना उचित नहीं है।
कार्यकाल समाप्त, नई कार्यकारिणी का गठन बाकी
मामला तब और गंभीर हो गया जब यह सामने आया कि कर्मचारी संघ के मौजूदा पदाधिकारियों का कार्यकाल 2 मार्च को ही समाप्त हो चुका है। इसके बावजूद अब तक नई कार्यकारिणी का गठन नहीं हो पाया है।
विरोधी गुट का कहना है कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद वर्तमान पदाधिकारी किसी भी प्रकार के आधिकारिक निर्णय लेने या बैठक बुलाने के वैधानिक अधिकार में नहीं हैं। ऐसे में अध्यक्ष द्वारा 16 मार्च को आमसभा बुलाने के निर्णय का भी कुछ कर्मचारियों ने विरोध किया है।
कर्मचारियों में बढ़ी असमंजस की स्थिति
कर्मचारी संघ के भीतर चल रही इस खींचतान के कारण विश्वविद्यालय के गैर-शिक्षण कर्मचारियों के बीच असमंजस की स्थिति बन गई है। एक ओर कुछ कर्मचारी चुनाव से पहले वित्तीय पारदर्शिता और लेखा-जोखा सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई कर्मचारी समय पर चुनाव कराकर नई कार्यकारिणी के गठन की बात कर रहे हैं।
परिस्थितियों को देखते हुए यह विवाद अब केवल मतदाता सूची या आय-व्यय के लेखा-जोखा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संघ के भीतर आपसी विश्वास और नेतृत्व को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।
अब सबकी निगाहें विश्वविद्यालय प्रशासन और निर्वाचन अधिकारी पर टिकी हुई हैं कि वे इस विवाद के बीच किस तरह चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं और कर्मचारी संघ में उत्पन्न गतिरोध को कैसे समाप्त करते हैं।


