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केरल : सीएम के राजनीतिक गुरु के बेटे ने कहा, विजयन हैं ‘गैंगस्टर’

तिरुवनंतपुरम, 21 जून (आईएएनएस)| कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष के. सुधाकरन ने जहां अपने पुराने दुश्मन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, वहीं केरल के मुख्यमंत्री पिनारयी विजयन को अब कन्नूर जिले के अपने घर पिनारयी गांव, पंडयाला शाजी से माकपा के पूर्व नेता से नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है, जो उन्हें गैंगस्टर कहते हैं। शाजी राज्य में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी के स्वयंसेवक ‘कप्तान’ पंड्यला गोपालन के पुत्र हैं। पार्टी का गठन 1939 में पिनारयी गांव के परप्पुरम में ई.एम.एस. नंबूदरीपाद, ए.के. गोपालन, एन.ई. बलराम और पी. कृष्णापिल्लई ने किया था।

विजयन पांड्यला गोपालन मास्टर के सबसे भरोसेमंद शिष्य थे, लेकिन शाजी के विजयन के साथ मतभेद थे और उन्होंने कम्युनिस्ट मार्क्‍सवादी पार्टी में शामिल होने के लिए पार्टी छोड़ दी।

आईएएनएस के साथ एक साक्षात्कार में, उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि कैसे विजयन ने लंबे समय तक तानाशाही प्रवृत्ति प्रदर्शित की और उन्होंने पार्टी क्यों छोड़ी।

स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के एक नेता और पार्टी के प्रमुख वक्ताओं में से एक, शाजी कथित माकपा के गुंडों द्वारा हमला किए जाने के बाद चले गए, जब उनके पिता थालास्सेरी में एक जनसभा की अध्यक्षता कर रहे थे, जिसमें मुख्य वक्ता विजयन थे।

यह पूछे जाने पर कि आपके पिता, गोपालन मास्टर, देश में कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक नेता और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी- मार्क्‍सवादी के 1964 में गठन के बाद से एक बड़े नेताओं में से एक थे। फिर आप क्यों पार्टी के खिलाफ हैं?

एन्होंने कहा, मैं पिनारयी विजयन द्वारा प्रचलित तानाशाही की राजनीति को बर्दाश्त नहीं कर सकता और जब मैंने थालास्सेरी शहर में एक सार्वजनिक कार्यक्रम का नेतृत्व किया, जिसमें मैंने विजयन के खिलाफ नारेबाजी की, नौकरी से संबंधित मतभेद के कारण नारे लगाने के बाद मैं उनके लिए आंख की किरकिरी बन गया।

मैं उन शिक्षकों के साथ था, जिन्हें अपनी नौकरी खोनी थी, जब जिस संस्थान में वे पढ़ा रहे थे, उस समय पिनारयी शहर में एक शैक्षिक सहकारी समिति द्वारा कब्जा कर लिया गया था। विजयन शिक्षकों को निष्कासित करने और संस्था को संभालने और इसे नए सिरे से शुरू करने के पक्षधर थे। इससे मतभेद हुआ और यह सड़कों पर पहुंच गया, जहां मैंने एक जुलूस का नेतृत्व किया और विजयन के खिलाफ नारे लगाए। यह एक ऐसा मुद्दा था जिसे विजयन नहीं भूल सकते थे, क्योंकि वह एक ऐसे व्यक्ति हैं जो अपने गुरु और राजनीतिक नेता गोपालन मास्टर के बेटे की आलोचनाओं को कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे।

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