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दिल्ली आशा वर्कर्स की टूटती उम्मीदें, लोगों की सेवा में जीवन समर्पित लेकिन अपनी मांगों के लिए करना पड़ता है संघर्ष

नई दिल्ली, 5 सितम्बर (आईएएनएस)| दिल्ली निवासी बबिता बीते 3 सालों से बतौर आशा वर्कर काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि, इतना काम करते हैं लेकिन हमें किसी तरह की कोई सुरक्षा नहीं दी जाती, वहीं महीने का इंसेंटिव भी बेहद कम है।

वो कहती हैं, हमारा कोई समय भी निर्धारित नहीं है, हर वक्त काम ही होता है। मेरे पति भी काम करते लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ठीक करने के लिए मुझे भी हाथ बंटाना पड़ता है।

कोरोना महामारी के समय में आशा वर्कर्स ने सबसे पहले आकर लोगों की जान बचाने का काम संभाला। इतना ही नहीं, हर घर में सर्वे करने से लेकर घर के सदस्यों की जांच, देखरेख तक आशा वर्कर्स ने संभाली, लेकिन आशा वर्कर्स खुद कितना परेशान रहते हैं, शायद ही किसी को इसका अंदाजा हो।

बबिता आगे बताती है, कोई मरीज आता है तो उसकी देखभाल की जिम्मेदारी हमारी है, टीकाकरण के लिए लोगों को बुलाना, जांच कराना हमारी जिम्मेदारी है।

कोरोना में हमसे कहा गया, एक कोरोना मामले पर 100 रुपये दिया जाएगा लेकिन वो भी मार्च तक दिया गया। अप्रैल महीने में इतने मामले सामने आए। उसके लिए हमें अभी तक कुछ नहीं दिया, काम भी हमें ही करना है। वरना धमकी दी जाती है कि निकाल दिए जाओगे।

बबिता अकेली आशा वर्कर नहीं जो इस तरह अपनी नाराजगी व्यक्त कर रही हो, अधिक्तर आशा वर्कर्स अपनी यही राय रखतीं हैं।

कुछ आशा वर्कर्स के अनुसार, हम जो भी मांग करते है वो बस मांग ही रह जाती है, कुछ होता तो है नहीं। अब फिर अपनी मांगों को लेकर 15 सितंबर को सीएम आवास जाएंगे।

आशा वर्कर जयमाला बताती हैं, कई लोग खुद ही डिस्पेंसरी चले जाते हैं, हमसे मना कर देते। लेकिन हमें फिर भी उनका ध्यान रखना पड़ता है। क्योंकि कल को कोई बात हो जाएगी तो हमारे ऊपर आएगा।

इसके अलावा लोग हमारे जरिये रजिस्ट्रेशन नहीं कराते इसलिए इंसेंटिव फिक्स हो जायेगा तो दिक्कते नहीं आएंगी।

दिल्ली एनसीआर में करीब 6268 आशा वर्कर्स हैं। एक आशा वर्कर करीब 400 घर संभालती है, यानी एक कॉलोनी में 2 हजार घर है तो उधर 3 आशा वर्कर तैनात किए जाते हैं।

वहीं आशा जिस क्षेत्र में रहती है वह उसी क्षेत्र के घरों की जिम्मेदारी दी जाती है। यदि पूरे देशभर की बात करें तो 10 लाख से अधिक आशा वर्कर काम करती हैं।

दरअसल आशा वर्कर्स हमेशा से यह मांग करती आई है कि उनका वेतन फिक्स कर दिया जाए, जबकि आशाओं को पॉइंट के आधार पर इंसेंटिव न दिया जाए।

दिल्ली आशा वर्कर एसोसिएशन की स्टेट कॉर्डिनेटर कविता ने आईएएनएस को बताया, हर आशा एक ही काम कर रही है, इसके बावजूद आशाओं को मिलने वाला कोर इंसेंटिव अलग अलग क्यों? कर्नाटक में 10 हजार है, केरल में 5 हजार, पश्चिम बंगाल और हरियाणा में यह 4 हजार है।

सरकार को इस इंसेंटिव को फिक्स कर देना चाहिए, इससे वह कम से कम जीने लायक तो कमाए। वेतन क्या है ? यदि आप वेतन नहीं दे रहे तो इंसेंटिव ऐसा दो की वह जी सके।

उन्होंने आगे बताया कि, कोविड के दौरान आशा वर्कर्स बीमार हुई लेकिन उनको इलाज तक का पैसा नहीं मिला। आशा वर्क्‍स को वेतन नहीं मिलता, इनको कोर इंसेंटिव मिलता है। जितना काम करेगी उसके आधार पर इंसेंटिव बनेगा।

पॉइंट के आधार पर दिए जाने वाले इंसेंटिव को फिक्स वेतन कर दिया जाए यानी 3 हजार महीने में मिले ही मिले।

हालांकि एसोसिएशन की ओर से मांग पत्र में कुछ मुख्य मांगे रखी है, जिसमें आशा वर्कर को सरकारी कर्मचारी का दर्जा मिले। वहीं कोर इन्सेटिव को पाइट मुक्त करके कम से कम 15 हजार रुपये करना चाहिए। सभी प्रकार की इंसेंटिव राशि बढ़ाकर तीन गुना करना चाहिए। या फिर दिल्ली में कुशल श्रमिक के अनुरूप निर्धारित (21 हजार) प्रतिमाह वेतन करना चाहिए।

सितम्बर 2019 में प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा आशा के इंसेंटिव को दो गुना करने की घोषणा को दिल्ली सरकार लागू करे। इसके लिए जरूरी हो तो केन्द्र सरकार पर भी अपने प्रभाव का उपयोग करें।

बिना इंसेटिव दिए कोई भी काम आशा से नहीं करवाया जाए। इसके लिए आशा पर कोई दबाब न डाला जाए।

इसके अलका कोविड में किये गए कार्य का इंसेंटिव प्रति दिन 650 रुपये या 18000 रुपये महीने के हिसाब से मार्च 2020 से दिया जाए।

इसके अलावा 2012-13 में हुए 45वें भारतीय श्रम सम्मेलन जिसमें केंद्र सरकार व राज्य सरकार के साथ साथ सभी यूनियनों की बैठक हुई थी।

इस सम्मेलन में यह सिफारिश की गई थी कि सभी स्कीम वर्कर्स को कर्मचारी का दर्जा और वेतन दिया जाना चाहिए परंतु अभी तक किसी भी सरकार ने आशा सहित सभी स्कीम वर्कर्स को कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया साथ ही अब तक वेतन नहीं दिया है।

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