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May 18, 2022
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सुर्खियों में रही जहांगीरपुरी की 1970 के दशक के बाद की कहानी

नई दिल्ली, 24 अप्रैल (आईएएनएस)| दिल्ली में जहांगीरपुरी बीते एक हफ्ते में काफी सुर्खियों में रहा। 16 अप्रैल से लेकर अब तक इलाके में तनावपूर्ण की स्थिति बनी हुई है और पूरा इलाका भारी पुलिस बल के शिकंजे में है, लेकिन इस तनाव को दूर करने के लिए रविवार को हिंदू-मुस्लिम समुदाय मिलकर तिरंगा यात्रा निकालेंगे। उत्तरी पश्चिमी दिल्ली के जहांगीरपुरी के डेढ़ किलोमीटर के क्षेत्र में करीब 5 लाख की आबादी है, जहां उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, गुजरात आदि राज्यों से लोग आकर बसे हुए हैं। इलाके में शुरूआत में अधिकतर झुग्गी झोपड़ियां बसी जिसके बाद धीरे धीरे छोटे-छोटे मकान बनना शुरू हो गए।

छोटे छोटे मकानों में लाखों की संख्या में रहने वाले लोग गुजर बसर करने के लिए कबाड़ बीनने, दुकान चलाने, रिक्शा चलाने, फैक्ट्रियों में काम करने, चूड़ियों के व्यापार, मछली बेचना, सब्जी मंडियां लगाने आदि कामों से जुड़े हुए हैं।

जहांगीरपुरी में बनी अमन कमेटी के सदस्य जाहिद, जो कि बीजेपी से भी जुड़े हुए हैं, उन्होंने बताया कि, 1970 के दशक में यूपी, राजस्थान और बिहार से आए लोग इस क्षेत्र में मंडियों से जुड़े हुए थे, मंडियों के कारण ही लोगों ने यहां बसना शुरू कर दिया। वहीं बिहार से आये लोग चूड़ियों का काम भी करते थे। साथ ही बंगाल से आए लोग कूड़ा बीनने का काम ही करते थे लेकिन अब कई परिवारों ने अपना व्यवसाय भी शुरू कर दिया है।

जहांगीरपुरी दिल्ली की तीन विधानसभा क्षेत्रों आदर्शनगर, बादली और बुराड़ी में बटी हुई है। वहीं इलाके में तीन सांसद और 6 पार्षद मिलकर यहां की मूलभूत सुविधाओं को मुहैया कराते हैं। सांसदों में हंसराज हंस, मनोज तिवारी और डॉ हर्षवर्धन शामिल है, वहीं विधायकों में अजेश यादव, संजीव झा और पवन शर्मा और पार्षदों में पूनम बागड़ी, अजय शर्मा, सुरेंद्र खरब, गरिमा गुप्ता और मुकेश गोयल हैं।

जाहिद के मुताबिक, 1978 में बाढ़ के दौरान यहां इंदिरा गांधी आई थीं और उन्ही के बाद ही यहां कॉलोनीयां बननी शुरू हुई। इस पूरे क्षेत्र में सिर्फ जंगल ही हुआ करता था और उस दौरान जिन लोगों के यहां मकान थे, वह मात्र 200 रुपए में ही मकान बेचकर चले गए।

जिस जामा मस्जिद के सामने ये हिंसा हुई उस मस्जिद की नींव 1978 में रखी गई थी, फिर यह धीरे धीरे मस्जिद बनती चली गई, साथ ही मस्जिद के साथ ही बने काली मंदिर को भी इस मस्जिद के करीब 6 साल बाद सन 1984 बनाने का काम शुरू हुआ।

इलाके के जानकारों के मुताबिक, उस दौरान यहां रह रहे बंगाल से आए मुसलमानों ने ही इस मंदिर के बनाने की शुरूआत की थी। हालंकि इस इलाके में इस तरह की हिंसा पहले कभी नहीं देखी गई, इलाके के ई ब्लॉक में मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा आसपास बने हुए हैं और सभी वर्षों से यहां मिलकर रह रहे हैं।

जहांगीरपुरी इलाके के कागजों में मकान साढ़े 22 गज के बने हुए हैं। ब्लॉक की बात करें तो इसमें डबल ई, ई ब्लॉक, डी ब्लॉक ,जी ब्लॉक, एच ब्लॉक, एच 1, एच 2, एच 3, एच 4, सी ब्लॉक, जे ब्लॉक आदि ब्लॉक शामिल है। इनमें कुछ ब्लॉक ऐसे हैं जिसमें झुग्गी झोंपड़ी बस रही हैं।

दिल्ली के इतिहास पर सालों से लिखने वाले इतिहासकार विवेक शुक्ला ने आईएएनएस को बताया कि, 1975 में जब देश में इमरजेंसी लगी तो दिल्ली में चार कॉलोनियां नए सिरे से बन और वहां झुग्गी झोपड़ियों वालों को बसाया गया। इनमें एक जहांगीरपुरी, मंगोल पुरी, खिचड़ीपुर और तुर्कमान गेट शामिल है।

जहांगीरपुरी, मंगोलपुरी और खिचड़ीपुर में नई दिल्ली और साउथ दिल्ली के झुग्गी झोंपड़ियों के लोगों को बसाया गया। उस दौरान वाल्मीकि और धोबी की एक अच्छी संख्या थी, तुर्कमान गेट में मुस्लिम बहुत थे जो रंजीत नगर गए और 1976 में जहांगीरपुरी बसना शुरू हुई।

इस बीच भाजपा दिल्ली सरकार पर रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुस्लिमों को बसाने का आरोप भी लगा रही है।

इलाके के कुछ जानकार लोगों ने बताया कि, इस क्षेत्र में पश्चिम बंगाल के लोग ज्यादा हैं, इस कारण उनकी भाषा बांग्लादेशियों से मिलती है। ऐसा नहीं कि यहां रोहिंग्या और बंगलादेशी रहते हैं। दिल्ली में अलग अलग राज्यों के लोग बसे हुए हैं।

मिली जानकारी के अनुसार, इलाके में न के बराबर बांग्लादेशी हैं जो वर्षों से यहां रह रहे हैं। हालांकि उनके पास भारत के दस्तावेज हैं चाहे फिर वो आधार कार्ड हो, पैन कार्ड हो या अन्य दस्तावेज।

दरअसल बीते शनिवार को हनुमान जयंती की शोभायात्रा के दौरान हिंसा हुई और देखते ही देखते क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया। हालंकि पुलिस इस हिंसा की जांच कर रही है और अब तक कई लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।

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