जबलपुर। सब सबको जाने सब सबको माने अभियान के अंतर्गत समरसता सेवा संगठन द्वारा “स्वामी विवेकानंद जी की जयंती” के अवसर पर मुख्य अतिथि मोहन चक्रवैश्य (केंद्र प्रमुख विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी जबलपुर) , मुख्य वक्ता अनिरुद्ध काडरवार (विभाग सह संघचालक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ), विशिष्ट अतिथि डॉ दिवांशु गौतम (प्रोग्राम ऑफिसर राष्ट्रीय सेवा योजना), समरसता सेवा संगठन अध्यक्ष संदीप जैन, सचिव उज्जवल पचौरी की उपस्थिति में विचार गोष्ठी का आयोजन अग्रवाल धर्मशाला, साकेत धाम के पास, ग्वारीघाट में किया गया। विचार गोष्ठी के उपरांत अतिथियों एवं आगँतुक जनों ने बादाम का पौधा रोंपकर प्रकृति संरक्षण का संकल्प लिया।
इस अवसर पर सिद्धबाला बोस लाइब्रेरी एसोसिएशन सिटी बंगाली क्लब के शताब्दी वर्ष पूर्ण होने पर अध्यक्ष सुब्रत पाल, सचिव प्रकाश साहा को सम्मान पत्र भेंट किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता अनिरुद्ध काडरवार ने विचार गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था जिनके उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक मत रुको, यहाँ लक्ष्य क्या है तो हम पाएंगे कि मनुष्य और पशु में अंतर क्या है तो बताया गया है मनुष्य के अंदर विवेक है और उसके अंदर धर्म है और अपने धर्म और विवेक से दुसरो का भला करना ही मनुष्यता है।
उन्होंने कहा स्वामी विवेकानंद जी का जीवन गुरु रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य के बाद बदल गया, उनके मन में ईश्वर को जानने और समझने का भाव उत्पन्न हुआ, उनकी इस जिज्ञासा का गुरु रामकृष्ण परमहंस ने समाधान किया उसके बाद उन्होंने सनातन की ध्वज पताका विश्व में फहराई।
श्री कादडरवार ने कहा समरसता और सेवा के लिए ह्रदय में आत्मीयता का भाव आवश्यक है और यही आत्मीयता का भाव स्वामी विवेकानंद ने अपने विचारों और वाणी से दिया।
मुख्य अतिथि मोहन चक्रवैश्य ने विचार गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा हमें एक सूत्र में बाँधने वाले स्वामी विवेकानंद जी की जन्म जयंती के अवसर पर हम एकत्र हुए है. स्वामी विवेकानंद जी जो बाल्यकाल से ही वैचारिक, आत्मीय और आध्यातमिक रूप से संपन्न थे, और स्वामी जी जिनका बचपन का नाम नरेन्द्र था, बालक नरेन्द्र के मन में बचपन से ही समरस और सनातन भारत का बीज प्रसफुटिट हुआ और आगे चलकर उन्होंने अपनी परंपरा, संस्कृति और विचारधारा को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा स्वामी विवेकानंद जी ने माना हमारा भारत न सिर्फ आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न और समृद्ध रहा है बल्कि हमारा भारत आध्यात्मिक, शिक्षा, तकनीक की दृष्टि से सनातन काल से समृद्ध रहा है फिर भी भारत उन्नति के उस शिखर पर क्यों नहीं है तब उन्होंने चिंतन किया और पाया कि सब कुछ होने के बाद भी हमारे अंदर आत्मविश्वास नहीं है और इसी आत्मविश्वास को बढ़ाने और दिखाने के लिए उन्होंने शिकागो के सम्मलेन में भारत का प्रतिनिधित्व किया और उसके बाद पाश्चात्य देशो ने भारत के प्रति अपने दृष्ठिकोण को बदला।
विशिष्ट अतिथि डॉ दिवांशु गौतम ने विचार गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा स्वामी विवेकानंद ने कहा था युवाओं में “समाजसेवा के माध्यम से व्यक्तित्व का विकास” करना चाहिए, और आज के परिपेक्षय में आज इस वाक्य को हमें अपने जीवन इसे उतराना चाहिए। स्वामी विवेकानंद जी ने जितना भी जीवन जिया उसमे उन्होंने सनातन संस्कृति का वास्तविक स्वरुप दुनिया के सामने रखा और न सिर्फ भारत के बल्कि विश्व के युवाओं का मार्ग प्रसस्त किया। आज उनकी जन्म जयंती पर हमें अपने जीवन उनके विचारों को आत्मसात करना होगा तभी पुनः हम विश्व गुरु बन सकेंगे।
कार्यक्रम की प्रस्तावना एवं स्वागत उद्बोधन सचिव उज्जवल पचौरी ने दिया।
कार्यक्रम का संचालन राजेश ठाकुर एवं आभार समरसता सेवा संगठन के अध्यक्ष संदीप जैन ने व्यक्त किया।
इस अवसर पर सुब्रत पाल, प्रकाश साहा, आचार्य पं रोहित दुबे, अभिमन्यु जैन, अनिल तिवारी, बालेश्वर पाल, रंजीत पटेल, अनिल तिवारी,धीरेंद्र कुमार मिश्रा, सोमेन गोस्वामी, रमेश सोंधिया, रतन केसरवानी मोहन बारी, भरत लाल बिरहा, नंदू विश्वकर्मा, शिवम सिंगौर, राजू साहू, त्रिलोकी नाथ पुरोहित, प्रहलाद चौरसिया, दिवाकर शर्मा, जी के अग्रवाल, राजेश अग्रवाल, महेश स्थापक, सुयश श्रीवास्तव, अमित शिवहरे, प्रकाश अग्रवाल, कृष्ण गुप्ता,अमित अग्रवाल आदि उपस्थित थे।


