जबलपुर। जिले में आबकारी विभाग की कथित मिलीभगत के चलते अधिकांश शराब ठेकेदारों ने एक बार फिर शराब के दाम बढ़ा दिए हैं। हालत यह है कि जो शराब का पौवा पहले 280 रुपये में मिलता था, वही अब 300 रुपये में बेचा जा रहा है। यही स्थिति देशी सफेद और देशी लाल शराब की भी बताई जा रही है।
शराब दुकानों में मनमाने दामों पर बिक्री से उपभोक्ताओं में भारी नाराजगी है। जब ग्राहक तय कीमत से अधिक वसूली का विरोध करते हैं, तो दुकानों के कर्मचारी उनसे अभद्रता पर उतर आते हैं।
बताया जाता है कि जब संजीव दुबे को सहायक आबकारी आयुक्त बनाकर जिले में पदस्थ किया गया था, तब उन्होंने ठेकेदारों को सख्त निर्देश दिए थे कि शराब केवल निर्धारित दरों पर ही बेची जाए। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि कम या अधिक कीमत पर शराब बेचने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इसके बाद कुछ समय तक जिले की शराब दुकानों में तय दरों पर ही बिक्री होती रही, लेकिन पिछले एक-दो दिनों से फिर से मनमानी शुरू हो गई है।
आबकारी विभाग की भूमिका पर उठ रहे सवाल
शहर में चर्चा है कि ठेकेदारों द्वारा दाम बढ़ाने का यह खेल आबकारी विभाग की मिलीभगत से हो रहा है। इससे जहां आबकारी अधिकारियों और ठेकेदारों की कमाई बढ़ रही है, वहीं आम जनता की जेब पर सीधा असर पड़ रहा है। जानकारों का कहना है कि इस अवैध वसूली से सरकारी राजस्व को भी नुकसान हो रहा है।
सहायक आबकारी आयुक्त की कार्यप्रणाली विवादों में
बताया जाता है कि सहायक आबकारी आयुक्त संजीव दुबे का विवादों से पुराना नाता रहा है। इंदौर पदस्थापना के दौरान उनका नाम आबकारी चालान घोटाले में सामने आया था, जिसकी जांच अभी भी लंबित बताई जा रही है। इसके अलावा, कुछ माह पूर्व बरेला में शराब ठेकेदार के कर्मचारियों और सहायक आबकारी आयुक्त के बीच हुए विवाद एवं मारपीट के मामले की जांच भी कथित तौर पर ठंडे बस्ते में डाल दी गई।
एक और चर्चा यह भी है कि सहायक आबकारी आयुक्त जब शराब दुकानों का निरीक्षण करने जाते हैं, तो विभागीय स्टाफ के बजाय निजी बाउंसरों को साथ लेकर जाते हैं, जिससे उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यदि निरीक्षण पारदर्शी ढंग से किया जाए, तो आबकारी विभाग के अधिकृत कर्मचारियों को ही साथ ले जाना चाहिए, न कि निजी सुरक्षा कर्मियों को।


