अनूपपुर । बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं है। यह उस गहरी बेचैनी का संकेत है, जो आज देश के शैक्षणिक परिसरों और समाज के भीतर लगातार बढ़ रही है। यूजीसी के Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को लेकर चल रही बहस अब कागज़ों तक सीमित नहीं रही। यह सड़कों, सोशल मीडिया और सत्ता के गलियारों तक पहुंच चुकी है।
प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों पर कथित हमले और यूजीसी के नए नियम, दोनों ही मुद्दों ने अलंकार अग्निहोत्री को भीतर से विचलित किया। उनका आरोप है कि ये नियम कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने के बजाय सवर्ण छात्रों के लिए नए प्रकार के उत्पीड़न का रास्ता खोल सकते हैं। यह चिंता इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि जब कानून और नियम असुरक्षा की भावना पैदा करने लगें, तो उनके मूल उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।सोशल मीडिया पर यूजीसी के नए प्रावधानों की तुलना एससी-एसटी एक्ट से की जा रही है। सामान्य वर्ग के छात्र खुद को निशाने पर महसूस कर रहे हैं। सबसे ज्यादा विवाद इस बात को लेकर है कि नए नियमों में ओबीसी को भी ‘जातिगत भेदभाव’ की श्रेणी में शामिल किया गया है। सवाल सीधा है। जिन वर्गों को पहले से आरक्षण और अन्य संरचनात्मक सुविधाएं मिल रही हैं, उन्हें उसी तराजू में रखना क्या बाकी छात्रों के साथ न्याय है?
इसी संदर्भ में मैं एक व्यंग्यात्मक लेकिन कड़वा तर्क रखा। अगर सच में जाति ही हर समस्या की जड़ है, तो क्यों न हम सब कुछ बांट लें। अपने-अपने स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी अलग कर लें। अपनी जाति के अध्यापक, प्रॉक्टर, डीन और विभागाध्यक्ष रखें। मेडिकल कॉलेज भी अलग हों, जहां अपनी ही जाति के डॉक्टर पढ़ाएं, और डॉक्टर बनकर निकलने वाले यह कसम खाएं कि इलाज भी केवल अपनी जाति का ही करेंगे।यहीं नहीं रुकते। अस्पताल अलग हों, डॉक्टर अलग हों। किसान और जमीन भी बांट ली जाए। अपनी जाति के किसानों द्वारा उगाया गया अनाज ही खाया जाए। सेनाएं भी बांट ली जाएं, अपनी-अपनी रेजिमेंट बना ली जाए और तय कर लिया जाए कि आपात स्थिति में कौन आगे जाएगा। और अगर बात यहां तक पहुंचती है, तो वे 525 रियासतें भी लौटा दी जाएं, जिन्हें अखंड भारत के लिए दान किया गया था। जमींदारी उन्मूलन में ली गई जमीनें भी वापस कर दी जाएं। बाकी सब आप रख लें। आप अपना देश बना लें, हम अपना बना लेते हैं।यह कटाक्ष नहीं है। यह उस सोच का आईना है, जो समाज को लगातार छोटे-छोटे खांचों में बांटने पर आमादा है।असल समस्या यह है कि हमारे देश में ओबीसी की कोई स्पष्ट और सर्वमान्य परिभाषा आज तक तय नहीं हो पाई। जाट हरियाणा में सवर्ण हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश और राजस्थान में ओबीसी माने जाते हैं, जबकि तीनों राज्यों के जाटों में आपसी वैवाहिक संबंध होते हैं। ऐसे में अगर हरियाणा का एक जाट, यूपी के जाट का उत्पीड़न करता है, तो क्या यूजीसी इसे अपने नियमों के तहत जातिगत भेदभाव मानेगी? यहीं आकर नियम असहज हो जाते हैं।
के


