जबलपुर। आधुनिकता के नाम पर यदि हम अपने मूल संस्कारों और आधार को ही छोड़ देंगे, तो हमारी धार्मिकता कहाँ रह जाएगी? यह विचार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने प्रातः प्रवचन सभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बच्चों की आड़ में अपने चरित्र बल को कमजोर करना उचित नहीं है। बच्चों के मन में मांसाहार के प्रति ग्लानि होनी चाहिए, ताकि वे सही संस्कारों के साथ आगे बढ़ सकें।
मुनि श्री ने वेज–नॉनवेज रिसॉर्ट संस्कृति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि लोग यह तर्क देते हैं कि अब दोनों के लिए अलग-अलग किचन होते हैं, लेकिन यह केवल बहाने हैं। उन्होंने याद दिलाया कि संस्कारधानी जबलपुर से ही वर्ष 1997 में पूरे देश को यह संदेश गया था कि दिन में विवाह, दिन में ही भोज होना चाहिए। जैन समाज के इस जयघोष को उस समय देशभर में अपनाया गया था, लेकिन समय के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ती चली गई। यदि समय-समय पर इस परंपरा को प्रोत्साहित किया जाता, तो आज भी यह सामाजिक चेतना बनी रहती।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब गृह प्रवेश दिन में होता है, तो विवाह जैसे पवित्र संस्कार रात में क्यों किए जाते हैं? यह बदलाव जागरूकता के साथ होना चाहिए, भटकाव के साथ नहीं।
सामाजिक व्यवस्थाओं पर हुई बैठक
इस अवसर पर धर्मप्रभावना समिति, दिगंबर जैन पंचायत, दिगंबर जैन युवा संघ, श्वेतांबर जैन समाज एवं सभा के संयुक्त तत्वावधान में सामाजिक व्यवस्थाओं को लेकर एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें समाज से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ। बैठक का संचालन अमित जैन पड़रिया ने किया।
ध्यान और आराधना में अंतर स्पष्ट किया
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं सुवोध जैन कामरेड ने बताया कि मुनि श्री ने संस्कृत में निवद्ध श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के चतुर्थ दिवस 64 रिद्धि मंत्रों के साथ अर्घ अर्पित कराते हुए प्रवचन दिए।
मुनि श्री ने कहा कि साधना के दो मार्ग होते हैं — ध्यान और आराधना।
ध्यान में स्वयं का आलंबन लिया जाता है, यह आत्मशुद्धि की प्रक्रिया है।
जबकि आराधना में परमात्मा का आलंबन लिया जाता है, जिसके माध्यम से हम अपने भीतर के परमात्मा से जुड़ते हैं।
उन्होंने कहा कि ध्यान की गहन साधना के लिए सबसे पहले मन और इंद्रियों पर विजय आवश्यक है, और यह विजय वही प्राप्त कर सकता है जिसने मोह पर नियंत्रण पा लिया हो। मोह पर विजय के लिए आत्मज्ञान अत्यंत आवश्यक है।
यंत्र, मंत्र और तंत्र का वास्तविक उद्देश्य
मुनि श्री ने कहा कि आजकल लोग भौतिक लाभ के लिए यंत्र, मंत्र और तंत्र का उपयोग करते हैं, लेकिन यह केवल फूल के समान है। हमें उसका फल प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। ये तीनों आत्मा में उतरने की गहन साधना हैं और जीवन का अनुपम उपहार हैं।
उन्होंने कहा कि यंत्र के आलंबन से ध्यान करने पर शरीर में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है, जिससे सकारात्मकता का संचार होता है और जीवन दृष्टिकोण बदलता है।
सिद्धचक्र महामंडल विधान
मुनि श्री ने कहा कि यह आठ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान भले ही समय में सीमित है, लेकिन इसे अपने जीवन की श्रेष्ठ आराधना का केंद्र बनाना चाहिए, जिससे जीवन में स्थायी रूपांतरण संभव हो।
कार्यक्रम की शुरुआत प्रातः 6:30 बजे मंगलाष्टक के साथ भगवान के अभिषेक एवं मुनि श्री के मुखारविंद से शांति धारा के साथ हुई। इसके बाद नित्य नियम पूजन एवं विधान प्रारंभ किया गया। 64 रिद्धि मंत्रों के साथ अर्घ समर्पित किए गए। विधान के पांचवें दिवस 128 अर्घ प्रभु भक्ति में समर्पित किए जाएंगे, और प्रतिदिन यह क्रम दुगुना होगा।
प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया एवं बाल ब्रह्मचारी अभय भैया ने सभी मांगलिक क्रियाएं संपन्न कराईं।


