जबलपुर। शहर के अथर्व चतुर्वेदी की कहानी आज पूरे देश के लाखों छात्रों के लिए प्रेरणा बन चुकी है। यह सिर्फ एक छात्र की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस जज्बे की मिसाल है, जो विपरीत हालात में भी हार मानने से इनकार कर देता है।
अथर्व ने NEET परीक्षा में 530 अंक हासिल किए थे, जो कि किसी भी सामान्य छात्र के लिए अच्छे माने जाते हैं। वह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) से आते हैं और उनका सपना डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करना था। लेकिन जब काउंसलिंग की प्रक्रिया शुरू हुई, तो उन्हें यह जानकर बड़ा झटका लगा कि कई निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण नीति लागू नहीं है। सरकारी कॉलेजों में सीटें सीमित थीं और निजी कॉलेजों में भारी फीस के कारण उनके लिए दाखिला लगभग असंभव हो गया।
यहां से शुरू होती है एक असाधारण संघर्ष की कहानी। ज्यादातर लोग ऐसे हालात में सिस्टम को दोष देकर चुप बैठ जाते, लेकिन अथर्व ने हार मानने के बजाय खुद संविधान का सहारा लिया। उन्होंने भारतीय संविधान के प्रावधानों को पढ़ना शुरू किया, सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का अध्ययन किया और खुद अपनी याचिका (SLP) तैयार की। यह काम आमतौर पर बड़े-बड़े वकील करते हैं, लेकिन एक 12वीं पास छात्र ने यह साहसिक कदम खुद उठाया।
दिल्ली जाकर केस लड़ने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए Supreme Court of India में खुद अपनी पैरवी की। जब मामला सुनवाई के लिए आया तो अथर्व ने CJI (मुख्य न्यायाधीश) की बेंच के सामने बेहद विनम्रता से सिर्फ 10 मिनट का समय मांगा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वह भी सिर्फ बराबरी का मौका चाहते हैं, कोई विशेष सुविधा नहीं।
अथर्व की दलीलों ने अदालत को गहराई से प्रभावित किया। कोर्ट ने माना कि अगर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को निजी कॉलेजों में भी उचित अवसर नहीं मिलते, तो यह सामाजिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए अथर्व को MBBS में प्रवेश देने का ऐतिहासिक आदेश सुनाया।
यह फैसला सिर्फ अथर्व के लिए नहीं, बल्कि हजारों EWS छात्रों के लिए उम्मीद की किरण बन गया। एक साधारण परिवार से आने वाला छात्र, बिना किसी बड़े संसाधन के, देश की सबसे बड़ी अदालत में खुद अपनी लड़ाई लड़कर जीत गया — यह भारतीय न्याय प्रणाली की संवेदनशीलता और युवा शक्ति की ताकत का अद्भुत उदाहरण है।
अथर्व चतुर्वेदी आज सिर्फ एक मेडिकल स्टूडेंट नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं की आवाज बन चुके हैं जो अपने हक के लिए लड़ना चाहते हैं, लेकिन रास्ता नहीं जानते। उनकी कहानी यह सिखाती है कि अगर हौसला मजबूत हो और इरादे साफ हों, तो संविधान सिर्फ किताब नहीं रहता, बल्कि इंसाफ पाने का सबसे बड़ा हथियार बन जाता है।


