28.5 C
Jabalpur
October 21, 2026
सी टाइम्स
जीवनशैलीडाउनलोडशिक्षासी टाइम्स

डिग्री हाथ में, जिम्मेदारियाँ कंधों पर और अवसरों का इंतजार: जबलपुर के युवाओं की बीतती उम्र का हिसाब कौन देगा?

संस्कारधानी जबलपुर को अपनी संस्कृति पर गर्व है। होना भी चाहिए। लेकिन किसी शहर की समृद्धि का पैमाना उसके समारोह, इमारतें और गौरवगाथाएँ ही नहीं होते; यह भी होता है कि वहाँ का युवा अपना भविष्य कितने सम्मान और भरोसे के साथ बना सकता है। जिस उम्र में उसे अपनी प्रतिभा सँवारनी चाहिए, अगर वह घर के राशन, माता-पिता की दवाइयों और महीने की किस्त के बीच अपने सपने काट रहा है, तो सवाल उसकी मेहनत पर नहीं, उपलब्ध अवसरों पर उठना चाहिए।

जबलपुर को इस सवाल से आँख मिलानी होगी—यहाँ पढ़ने वाला युवा अपनी योग्यता के अनुरूप काम पाने के लिए आखिर कहाँ जाए? हर व्यक्ति सरकारी नौकरी नहीं चाहता। कोई तकनीक में आगे बढ़ना चाहता है, कोई कारोबार करना चाहता है, कोई रचनात्मक काम में पहचान बनाना चाहता है। लेकिन इच्छा और जिम्मेदारी के बीच जब घर का खर्च खड़ा हो जाता है, तो युवा अक्सर वह काम स्वीकार करता है जो मिल रहा है। उसके लिए पसंद की नौकरी की तलाश जारी रखना भी एक आर्थिक सुविधा बन जाती है।

टेलीकॉलिंग, सेल्स, किराना दुकान, सब्जी का व्यवसाय या कैंटीन चलाना—हर काम सम्मानजनक है। सवाल इन कामों की प्रतिष्ठा का नहीं, चुनाव की आजादी और मेहनत के प्रतिफल का है। किसी प्रशिक्षित युवा का अपनी इच्छा से व्यवसाय चुनना और अवसर के अभाव में अपनी विशेषज्ञता छोड़ देना अलग स्थितियाँ हैं। मेहनत का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं कि कम वेतन और मजबूरी को भी आदर्श बना दिया जाए।

चार हजार से दस हजार रुपये महीने की कमाई का उदाहरण ही सामने रखिए। क्या इसमें किराया, भोजन, आने-जाने का खर्च, मोबाइल, माता-पिता का इलाज और भविष्य की बचत संभव है? इसे पूरे जबलपुर का प्रमाणित औसत वेतन मानना उचित नहीं होगा, लेकिन इतनी आय पर परिवार सँभालने वाले किसी भी युवा की कठिनाई समझने के लिए बड़े सर्वेक्षण की जरूरत नहीं। कभी एक बीमारी, कभी घर की मरम्मत, कभी पढ़ाई का खर्च उसे उधार लेने को विवश कर सकता है। फिर अगली तनख्वाह आने से पहले उसका एक हिस्सा किस्तों के नाम हो जाता है।

कबीर की पंक्ति है—“साईं इतना दीजिए, जामें कुटुम समाय।” परिवार का सम्मानपूर्वक भरण-पोषण कोई असाधारण आकांक्षा नहीं है। आज का युवा भी इतना तो चाह सकता है कि उसके श्रम से घर चले और अचानक आया खर्च उसकी पूरी जिंदगी न हिला दे।

सरकार से सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि रोजगार उसकी घोषणाओं का प्रमुख विषय है। जुलाई 2024 में जबलपुर में आयोजित रीजनल इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव में प्रदेश के लिए लगभग 17 हजार करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिलने की जानकारी सामने आई थी। निवेश की पहल स्वागतयोग्य है, लेकिन प्रस्ताव से उत्पादन और उत्पादन से स्थानीय नियुक्ति तक की दूरी का हिसाब भी चाहिए। इनमें से जबलपुर में कितनी परियोजनाएँ शुरू हुईं? कितने स्थानीय युवाओं को काम मिला? किस वेतन पर मिला और कितनों की नौकरी टिक सकी?

निवेश के मंच पर तालियाँ बज सकती हैं; घर का चूल्हा खाते में आए वेतन से जलता है। रोजगार मेले में पंजीयन, प्रशिक्षण का प्रमाणपत्र और नियुक्ति के बाद नियमित आय—तीनों अलग उपलब्धियाँ हैं। सरकार और प्रशासन को इन्हें अलग-अलग बताना चाहिए। किसी योजना की सफलता उसके विज्ञापन के आकार से नहीं, लाभ पाने वाले युवाओं के जीवन में आए बदलाव से मापी जानी चाहिए।

यहीं राजनीति की जवाबदेही तय होती है। युवाओं को चुनाव के समय सबसे बड़ी शक्ति बताने वाले प्रतिनिधि चुनाव के बाद उनकी नौकरी, वेतन और उद्यम की प्रगति पर कितनी नियमित चर्चा करते हैं? यदि उपलब्धि गिनाने के लिए घोषणाएँ हों और परिणाम पूछने पर केवल आश्वासन, तो वोटबैंक की राजनीति का सवाल उठेगा ही। उसका उत्तर युवाओं को धैर्य का उपदेश देकर नहीं, सार्वजनिक और जाँचने योग्य नतीजे देकर देना होगा।

बारहवीं उत्तीर्ण करने के बाद किसी विद्यार्थी के सामने केवल अगली डिग्री का फॉर्म नहीं, आगे के जीवन का स्पष्ट रास्ता भी होना चाहिए। कॉलेज, प्रशिक्षण संस्थान और स्थानीय उद्योग मिलकर बताएँ कि कौन-से कौशल की माँग है, कहाँ सवेतन प्रशिक्षण मिलेगा और शुरुआती नौकरी से आगे बढ़ने का रास्ता क्या होगा। युवतियों के लिए सुरक्षित आवागमन और सुरक्षित कार्यस्थल भी रोजगार के प्रश्न का हिस्सा हैं।

उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं या बेहतर काम के लिए बाहर जाना स्वाभाविक है। चिंता तब है जब अपने शहर में रहना चाहने वाला युवा भी अवसरों की कमी से जाने को विवश हो। हर किसी के पास दूसरे शहर का किराया, कोचिंग की फीस और वर्षों की तैयारी का खर्च उठाने की क्षमता नहीं होती। बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करने वाला युवा अपना शहर छोड़ भी कैसे दे? क्या जिम्मेदार संतान होने की कीमत उसे अपने पेशेवर भविष्य से चुकानी चाहिए?

स्वरोजगार की सलाह देना आसान है। उसे टिकाऊ बनाना कठिन। कोई युवा स्टार्टअप शुरू करना चाहे तो उसे पूँजी के साथ मार्गदर्शन, ग्राहक और बाजार तक पहुँच भी चाहिए। आवेदन की स्थिति अस्पष्ट हो, दस्तावेजों के लिए बार-बार जाना पड़े या निर्णय की समयसीमा न हो, तो रोज की कमाई पर निर्भर व्यक्ति कितना इंतजार करेगा? योजनाओं में आवेदन से निर्णय तक स्पष्ट समयसीमा और अस्वीकृति का लिखित कारण होना चाहिए। व्यवसाय शुरू होने के बाद भी सहायता जारी रहनी चाहिए।

डिजिटल माध्यमों, कंटेंट निर्माण और इन्फ्लुएंसर के रूप में काम करना भी संभावनाओं का रास्ता है। लेकिन कुछ व्यक्तियों की सफलता को पूरे शहर की रोजगार नीति का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। हर प्रतिभा कैमरे के सामने नहीं खिलती और ऑनलाइन लोकप्रियता हमेशा स्थिर आय की गारंटी नहीं होती।

नशे और अपराध की चिंता भी इसी गंभीरता से उठनी चाहिए। जबलपुर पुलिस के एक विवरण के अनुसार, 23 जून 2025 को नशीले इंजेक्शनों के मामले में 20 और 24 वर्ष के दो आरोपियों को गिरफ्तार कर 118 इंजेक्शन जब्त किए गए थे। यह घटना चिंताजनक है, लेकिन ऐसी घटनाओं के आधार पर हाल के महीनों में युवा अपराध बढ़ने का निष्कर्ष निकालने के लिए उम्रवार और वर्षवार तुलनात्मक आँकड़े आवश्यक हैं।

उतना ही जरूरी है कि बेरोजगार युवाओं को अपराध से जोड़कर कलंकित न किया जाए। आर्थिक संघर्ष के बीच ईमानदारी से परिवार सँभालने वाले युवा सम्मान के अधिकारी हैं। बेरोजगारी अपराध का प्रमाण नहीं और कठिन परिस्थिति अपराध का औचित्य नहीं। नशा, आपराधिक संगति, अवैध कमाई का आकर्षण और अवसरों का अभाव—इनकी भूमिकाओं की पड़ताल करनी होगी; किसी एक कारण का नाम लेकर जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।

पुलिस की कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उसकी सफलता का मूल्यांकन जब्ती और गिरफ्तारी से आगे भी होना चाहिए। आपूर्ति के स्रोतों पर क्या कार्रवाई हुई? दोबारा कारोबार रोकने के क्या उपाय हुए? नशे से बाहर आना चाहने वाले युवाओं को उपचार और पुनर्वास कहाँ मिला? परिवारों की शिकायत पर कितनी जल्दी सहायता पहुँची? नियंत्रण का दावा लोगों के रोजमर्रा के अनुभव में दिखाई देना चाहिए।

जबलपुर को अब समयबद्ध युवा रोजगार कार्ययोजना चाहिए। हर तिमाही सार्वजनिक विवरण आए—कितनी वास्तविक नियुक्तियाँ हुईं, वेतन कितना था, छह महीने बाद कितने लोग काम पर बने रहे और कितने नए उद्यम चल रहे हैं। नियोक्ता उचित वेतन, समय पर भुगतान और सीखकर आगे बढ़ने के अवसर दें। शिक्षण संस्थान अपने विद्यार्थियों के रोजगार परिणाम बताएँ। जनप्रतिनिधि इन नतीजों पर खुली समीक्षा करें। जिम्मेदारी साझा है, इसलिए किसी के पास दूसरे की ओर उँगली उठाकर बच निकलने की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

समाज को भी युवाओं से हर मुलाकात में केवल यह पूछना बंद करना होगा कि “अभी तक लगे क्यों नहीं?” कभी यह भी पूछना चाहिए कि उन्हें अवसर कहाँ मिला, किस शर्त पर मिला और उनकी सहायता कैसे की जा सकती है। अपनी पसंद का काम न मिलना किसी व्यक्ति की योग्यता का अंतिम फैसला नहीं है।

सरकार का कार्यकाल दोबारा आ सकता है; युवा की तेईस, पच्चीस या अट्ठाईस वर्ष की उम्र दोबारा नहीं आएगी। अवसरों के इंतजार में बीते साल किसी माफी, नई घोषणा या अगले चुनाव के वादे से वापस नहीं मिलते।

संस्कारधानी की पहचान तभी सार्थक होगी जब वह अपने युवाओं की प्रतिभा और समय का भी सम्मान करे। अब जवाब उसी युवा को देना है जो सुबह काम पर निकलता है, शाम को घर का खर्च जोड़ता है और रात को अपने अधूरे सपनों से कहता है—कुछ दिन और।

आखिर कितने दिन और?

अन्य ख़बरें

एक सेल्फी बताएगी कैंसर से बचने की कितनी उम्मीद? एआई के नए प्रयोग ने जगाई उम्मीद

Newsdesk

इन 7 जगहों पर नहीं जलाया जाता रावण का पुतला, कहीं मंदिर तो कहीं होती है पूजा

Newsdesk

दिन में थकान से बुरा हाल, रात में टूट जाती है नींद? कहीं मेनोपॉज तो नहीं इसकी वजह

Newsdesk

Leave a Comment

Discover more from सी टाइम्स

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading