नई दिल्ली, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने बुधवार को नई दिल्ली में जनसंघ के 75वें स्थापना दिवस संबोधित किया और कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे पुरोधाओं द्वारा ‘राष्ट्र प्रथम’ और ‘अंत्योदय’ के भाव से रोपा गया जनसंघ का बीज आज विश्व की सबसे बड़ी पार्टी रूपी विशाल वटवृक्ष बन चुका है। उन्होंने आह्वान किया कि आज की पीढ़ी को पूर्वजों के निस्वार्थ संघर्ष से प्रेरणा ले और पीएम मोदी के नेतृत्व में विकसित भारत व देश को विश्वगुरु बनाने के संकल्प को पूरा करने के लिए समर्पित होकर कार्य करना चाहिए। कार्यक्रम के दौरान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, विधानसभा अध्यक्ष वीरेंद्र गुप्ता, दिल्ली प्रदेश की सह-प्रभारी दर्शना जरदोश, पार्टी के वरिष्ठ नेता वी सतीश, महेश चंद शर्मा, जुगल किशोर शर्मा, ओपी बब्बर, योग ध्यान आहूजा, लाल बिहारी तिवारी, सुभाष आर्या, मूलचंद चावला, वेदव्यास महाजन, जगदीश मुखी, जीतन राम सोलंकी तथा वरिष्ठ नेतागण मौजूद थे।
नितिन नवीन ने कहा कि जगदीश जी और अन्य सभी वक्ताओं ने जो संस्मरण सुनाए हैं, उनकी पीढ़ी को भविष्य की भाजपा के निर्माण में निश्चित रूप से मार्गदर्शन प्रदान करेंगे, क्योंकि उन्होंने उस बीज को रोपा था जिसके फल क्या मिलेंगे, इसकी चिंता किसी ने नहीं की थी। उनके मन में केवल यही विचार था कि आजादी के बाद भारत कैसा होना चाहिए और उस भारत की कल्पना क्या होनी चाहिए। आजादी के समय लाखों लोगों ने कुर्बानियां दीं और सभी का केवल एक ही ध्येय था कि भारत आजाद हो, स्वतंत्र हो, और स्वतंत्र होने के साथ-साथ ऐसा लोकतंत्र स्थापित हो जिसमें सबका चिंतन हो, विकास की योजनाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, सांस्कृतिक विरासत की जड़ें मजबूत हों, और देश एक स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में उभरे। उन्होंने कहा कि जब मैं आज जनसंघ के उस पूरे चित्र को देख रहे था, तो उसमें एक शब्द का प्रयोग दिल्ली प्रदेश ने बहुत सुंदर ढंग से किया था, “जनसंघ से जन-जन की यात्रा”, जिसके लिए मैं आप सबको बधाई देता हूं।
वरिष्ठ पुरोधाओं ने जो सपना देखा था और जो भारतीय जनसंघ के अध्यक्षों की तस्वीरों में भी झलकता है, उस सपने को साकार करने के लिए ही जन-जन की इस विकास यात्रा में हर व्यक्ति को विकास के साथ जोड़ने का जो संकल्प प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया है, उस यात्रा को आगे बढ़ाने का संकल्प और समर्पण हम सभी के भीतर होना चाहिए। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि 75 वर्ष पूर्व, 21 अक्टूबर 1951 को, पार्टी की स्थापना के समय न कार्यालय थे, न पर्याप्त संसाधन थे, और न ही आवागमन के साधन थे। कई बार कार्यकर्ताओं के पास रसीदें रखने तक की जगह नहीं होती थी। इसके बावजूद उनके मन में केवल एक ही संकल्प था कि संगठन और उसके विचारों को जन-जन तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को सब कुछ अनुकूल परिस्थितियों में मिला है। भाजपा के विचार आज हर गली, मोहल्ले, गांव और घर तक पहुंच चुके हैं, विकास की योजनाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही हैं, और नेतृत्व की पहचान भी घर-घर में है। ऐसे में पार्टी को और अधिक सशक्त बनाने की जिम्मेदारी उनकी पीढ़ी की है। उन्होंने कहा कि उस दौर में संसाधनों और अनेक चुनौतियों के बावजूद वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का संकल्प अटूट रहा।
आज की पीढ़ी को भी उसी दृढ़ता के साथ अपने संकल्पों को आगे बढ़ाना होगा, तभी भारत को विश्वगुरु बनाने का वह सपना साकार हो सकेगा, जिसे उनके पूर्वजों ने देखा था। नितिन नवीन ने कहा कि आज कई चर्चाएं उनके वरिष्ठों ने कीं, जिसमें बताया गया कि उन्होंने तीन के आंकड़े से शुरुआत की थी और तीन से लेकर तीसरी बार देश में अपनी सरकार बनाई है। लेकिन आज भी उन सबको उसी प्रकार के समर्पण की आवश्यकता है, आज भी उसी प्रकार के संघर्ष की आवश्यकता है और आज भी उसी प्रकार के संकल्प की आवश्यकता है, क्योंकि अगर उन्हें भविष्य का सुनहरा भारत बनाना है, तो उन्हें अपने समय में भी उसी संघर्ष के साथ आगे बढ़ना पड़ेगा। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि जब मैं इन 75 वर्षों की यात्रा को देखता हूं, तो यह विचार मन में आता है कि किस प्रकार के राष्ट्रवादी चिंतन ने लाखों हिंदुस्तानियों के बलिदान के बाद एक संगठन के निर्माण की परिकल्पना की। उस समय डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी केंद्र सरकार में मंत्री होते हुए भी व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि रखते थे।
उन्हें लगा कि जिस उद्देश्य और विचार के साथ देश को आजादी मिली थी, वह कहीं न कहीं अपने मार्ग से भटक रहा है। उस दौर में सत्ता में बैठी सरकार पश्चिमी और वामपंथी विचारों से प्रभावित दिखाई देती थी तथा राष्ट्रवादी चिंतन और राष्ट्रीय हितों के प्रति अपेक्षित प्रतिबद्धता नहीं दिखती थी। ऐसे समय में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने सहयोगियों से विचार-विमर्श कर न केवल मंत्री पद से इस्तीफा दिया, बल्कि देश को यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि भारत की स्वतंत्रता के मूल उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वे संघर्ष करने को तैयार हैं। इसी राष्ट्रवादी चेतना और संकल्प के साथ भारतीय जनसंघ की स्थापना की गई। नितिन नवीन ने कहा कि आज जब उन्हें विभिन्न विषयों को सुनने और संगठन की यात्रा के अनेक पड़ावों को जानने का अवसर मिला, तो पाया कि चाहे गोवा का विषय हो या पश्चिम बंगाल का, दोनों ही मामलों में देश की एकता और ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना को आगे बढ़ाने का कार्य भारतीय जनसंघ ने किया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद भी जनसंघ उनके संकल्पों को आगे बढ़ाता रहा।
वर्ष 1961 में गोवा को भारत से जोड़ने का प्रश्न हो या पश्चिम बंगाल के हिंदू बहुल क्षेत्रों के हितों की रक्षा का मुद्दा, भारतीय जनसंघ ने हर स्तर पर राष्ट्रहित के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद की। नितिन नवीन ने उन सभी कार्यकर्ताओं और नेताओं का अभिनंदन किया जिन्होंने राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए संघर्ष किया। यदि उस समय ऐसे प्रयासों का विरोध न हुआ होता, तो आजादी के बाद भी देश को विभाजित करने की प्रवृत्ति लगातार जारी रहती। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि जब वे जनसंघ के अपने वरिष्ठों को याद करते हैं और उनकी स्मृतियों को सुनते हैं, तो एक ओर ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना सामने आती है, वहीं पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का ‘अंत्योदय’ का विचार भी स्मरण होता है, जिसका उद्देश्य विकास की योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनसंघ के इसी संकल्प और विचार को अपनी नीतियों एवं योजनाओं में समाहित किया है। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर कई लोकतंत्रों को चुनौती देने और अराजकता फैलाने के प्रयास हो रहे हैं, लेकिन उन्हें विश्वास है कि जनसंघ द्वारा रोपे गए विचार और संस्कार देश के 140 करोड़ नागरिकों को एक सूत्र में बांधकर राष्ट्रहित में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहेंगे। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि आज सभी कार्यकर्ताओं के लिए यह अवसर केवल अपने वरिष्ठों के विचारों को याद करने का ही नहीं, बल्कि उनकी सादगी, समर्पण और संगठन निर्माण के प्रति उनके त्याग से प्रेरणा लेने का भी है।


