April 3, 2026
सी टाइम्स
प्रादेशिक

“धर्म को धारण करने वाला ही सिद्धचक्र में प्रवेश करता है”



श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के तीसरे दिवस मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज के प्रेरक उद्गार
जबलपुर। श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के तीसरे दिवस भावनायोग प्रणेता मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को आत्ममंथन की गहरी प्रेरणा दी। मुनि श्री ने कहा कि केवल धार्मिक क्रियाएं करने से व्यक्ति धर्मात्मा नहीं बनता, बल्कि जो धर्म को अपने जीवन और आत्मा में उतार ले वही वास्तव में सिद्धचक्र में प्रवेश करने का अधिकारी होता है।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं सुवोध कामरेड ने जानकारी दी कि मुनि श्री ने प्रातः जैन मुनियों की उत्कृष्ट चर्या का पालन करते हुए स्वयं अपने हाथों से दाढ़ी-मूंछ आदि के बाल उखाड़े और आज उपवास भी रखा। यह दृश्य साधना, संयम और आत्मनियंत्रण का जीवंत उदाहरण बन गया।
प्रवचन में मुनि श्री ने कहा कि इस धर्मसभा में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जो णमोकार महामंत्र को न जानता हो। णमोकार महामंत्र अर्थात पंच परमेष्ठी का स्मरण ही जीवन की सबसे बड़ी साधना है। सिद्धचक्र विधान में प्रतिदिन पंच परमेष्ठी की पूजा होती है, लेकिन केवल जप करने से नहीं, बल्कि उसे हृदय में धारण करने से ही वास्तविक मुक्ति का मार्ग खुलता है।
उन्होंने कहा, “भगवान की पूजा करोगे तो पुण्य बंधेगा, लेकिन अपने स्वरूप को जानोगे तो जीवन ही पुण्य बन जाएगा।” मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से प्रश्न करते हुए कहा कि सोचो, तुम क्या चाहते हो—केवल पुण्य बांधना या पूरे जीवन को पुण्यमय बनाना? पुण्य किसी चमत्कार से नहीं बढ़ता, उसके लिए आत्मदृष्टि और तत्वमुखी सोच जरूरी है।
मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि धार्मिक होना आसान है, क्योंकि संस्कार, गुरु और समाज धर्म की ओर ले जाते हैं, लेकिन धर्मात्मा बनना कठिन है। “धार्मिक वह है जो धर्म की क्रिया करे, और धर्मात्मा वह है जो धर्म को आत्मा में बसा ले।” उन्होंने कहा कि सच्चा धर्म वही है जिससे मन में स्थिरता, समता, शांति और आनंद उत्पन्न हो।
सिद्धचक्र विधान से सभी को पुण्य लाभ मिल रहा है, लेकिन असली कसौटी यह है कि हमारे हृदय में कितनी पवित्रता, अहोभाव और विशुद्धि है। मुनि श्री ने कहा कि शास्त्रों के अनुसार पुण्य का मूल कारण बाहरी कर्म नहीं, बल्कि अंतर्मन की विशुद्धि है। जितनी अधिक आत्मशुद्धि, उतना अधिक पुण्य और उतना ही पाप का क्षय। अंत में उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि “मैं कौन हूं, मेरा क्या है” इस प्रश्न पर चिंतन कर आत्मदृष्टि को जाग्रत करें, क्योंकि धर्म को धारण करने वाला ही वास्तव में सिद्धचक्र में प्रवेश करता है।

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