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April 3, 2026
सी टाइम्स
प्रादेशिक

“कर्मबोध से कर्मक्षय की ओर बढ़ो, तभी जीवन का उत्कर्ष” : मुनि प्रमाणसागर जी



जबलपुर। “मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी विचित्रता यह है कि वह कर्म के फल से तो बचना चाहता है, पर कर्म से बचने का प्रयास नहीं करता।”
यह उद्गार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के छठवें दिवस प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यक्त किए।
मुनि श्री ने कहा कि जीवन में चार महत्वपूर्ण अवस्थाएँ हैं— कर्म का बोध, कर्म का बंध, कर्म का भोग और कर्म का क्षय। जब मनुष्य को यह बोध हो जाता है कि उसकी आत्मा में कर्म ऐसा तत्व है जो चेतना को परतंत्र बना रहा है, तभी जीवन की दिशा बदलती है।
उन्होंने कहा कि कर्म का बोध केवल शास्त्र पढ़ने से नहीं होता, बल्कि संसार को गहराई से देखने से भी होता है। सड़क चलते जब हम दिव्यांग, विकृतांग, अनाथ, रोगी और पीड़ित व्यक्तियों को देखते हैं, तो यदि मन में यह भाव जागे कि “यदि इनकी जगह मैं होता तो?”— तभी कर्म का वास्तविक बोध होता है। जो व्यक्ति संसार की विचित्रताओं की जड़ में झांकता है, वही कर्म को समझ सकता है और वही कर्म का क्षय कर सकता है।
कर्म का बंध कैसे होता है
मुनि श्री ने कर्म बंध को उदाहरण द्वारा समझाते हुए कहा कि जैसे कैमरा हमारे हर शब्द और क्रिया को रिकॉर्ड करता है, वैसे ही हमारे मन, वचन और शरीर की प्रत्येक प्रवृत्ति आत्मा पर संस्कार छोड़ती है। इन्हीं प्रवृत्तियों के कारण आत्मा के साथ कर्म रूपी सूक्ष्म परमाणु जुड़ जाते हैं, यही कर्म का बंध है।
जैसे हमारे भाव, विचार और आचरण होते हैं, वैसे ही कर्म के संस्कार हमारी चेतना में जुड़ते जाते हैं। व्यक्ति अपराध से तो डरता है क्योंकि उसे दंड दिखता है, पर पाप से नहीं डरता क्योंकि उसे कर्म का बोध नहीं होता।

दोष दूसरों का नहीं, अपने कर्म का

मुनि श्री ने कहा कि संसार में जितने भी संयोग और वियोग हैं, वे सब कर्म के नैमित्तिक परिणाम हैं। इसमें किसी दूसरे का वास्तविक कर्तृत्व नहीं होता। हम दूसरों को दोष देते हैं, जबकि वास्तव में जो कुछ घट रहा है, वह हमारे अपने कर्मों का ही फल है।
उन्होंने महासती अंजना माता का उदाहरण देते हुए कहा कि उन पर भी कर्म का उदय आया, उन्हें निर्दोष होते हुए भी अपमान सहना पड़ा, लेकिन उन्होंने किसी को दोष नहीं दिया। उन्होंने समझा कि यह मेरे ही कर्म का खेल है। इतना बड़ा कष्ट होने पर भी वे न टूटीं, न विचलित हुईं, क्योंकि उन्हें कर्म का बोध था। यही आत्मबोध कर्म को क्षय करने की शक्ति देता है।
मुनि श्री ने कहा—
“दूसरा व्यक्ति होता तो या तो अवसाद में चला जाता, या न्यायालय के चक्कर लगाता, या आत्महत्या कर लेता। लेकिन अंजना माता ज्ञानी थीं, पराक्रमी थीं और आत्मबोध से संपन्न थीं, इसलिए कर्म स्वयं बोरिया-बिस्तर बांधकर चला गया।”

विशाल धर्मसभा में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

इस अवसर पर मुनि श्री संधानसागर महाराज सहित समस्त क्षुल्लक महाराज मंचासीन थे।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं सुवोध कामरेड ने बताया कि प्रातः 6:30 बजे से सभी मांगलिक क्रियाएं संपन्न हुईं। मुनि श्री के मुखारविंद से शांति मंत्रों के साथ शांतिधारा संपन्न हुई।
विधानाचार्य बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया एवं बाल ब्रह्मचारी अभय भैया के निर्देशन में अमित वास्तु, पंडित सुदर्शन शास्त्री एवं सोनल शास्त्री ने विधान संपन्न कराया। संचालन अमित पड़रिया ने किया।
पूरे पांडाल में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही। दर्शनार्थियों के लिए विशेष रैंप की व्यवस्था की गई थी, जिससे सभी को सुगमता से गुरुदेव के दर्शन प्राप्त हुए।
लगभग 20 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने दर्शन कर धर्मलाभ लिया।

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