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April 4, 2026
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अब मिट्टी नहीं, हवा में आलू उत्पादन, ग्वालियर की लैब में हाई-टेक एरोपोनिक्स से खेती में नया प्रयोग



ग्वालियर, 6 फरवरी । मध्य प्रदेश के ग्वालियर में खेती के क्षेत्र में एक बेहद दिलचस्प और आधुनिक प्रयोग किया जा रहा है। यहां अब आलू जमीन में नहीं, बल्कि हवा में उगाए जा रहे हैं। यह अनोखा काम शहर में स्थित राजमाता विजया राजे सिंधिया विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की एरोपोनिक्स लैब यूनिट में हो रहा है। इस लैब में करीब 20 अलग-अलग किस्मों के आलू के बीज तैयार किए जा रहे हैं, जो पूरी तरह से हेल्दी, शुद्ध और बीमारी-मुक्त बताए जा रहे हैं।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग की वैज्ञानिक डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया कि इस तकनीक में सबसे पहले टिशू कल्चर के जरिए लैब में आलू के पौधे तैयार किए जाते हैं। जब ये पौधे थोड़े मजबूत हो जाते हैं, जिसे हार्डनिंग कहा जाता है, तब इन्हें एरोपोनिक्स यूनिट में ट्रांसप्लांट किया जाता है। यहां खास बात यह है कि पौधे मिट्टी में नहीं लगाए जाते, बल्कि उनकी जड़ें हवा में लटकी रहती हैं। पौधे के रूट वाले हिस्से को थोड़ा काट दिया जाता है और फिर मिस्ट या फॉगिंग तकनीक के जरिए पोषक तत्व दिए जाते हैं।

डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया कि इस यूनिट में हर तीन मिनट में करीब 30 सेकेंड के लिए फॉगिंग की जाती है। इसी फॉग के जरिए पौधों को वे सारे न्यूट्रिशन मिलते हैं, जो सामान्य तौर पर मिट्टी से मिलते हैं। यूनिट के अंदर तापमान को पूरी तरह कंट्रोल किया जाता है, ताकि पौधों की ग्रोथ सही तरीके से हो सके। कुछ ही दिनों में जड़ों का अच्छा विकास हो जाता है और करीब 45 से 55 दिनों के अंदर हवा में ही आलू बनने लगते हैं। जब आलू तैयार हो जाते हैं, तो पूरा यूनिट ऊपर उठाया जाता है और आलू साफ-साफ दिखाई देने लगते हैं। इसी वजह से इसे हवा में आलू उत्पादन कहा जाता है।

डॉ. तिवारी के मुताबिक इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें तैयार होने वाले आलू के बीज पूरी तरह बीमारी-मुक्त होते हैं। इनकी क्वालिटी बेहद अच्छी होती है और ये बिल्कुल शुद्ध रूप में तैयार होते हैं। इसी कारण ये बीज सामान्य बीजों की तुलना में ज्यादा भरोसेमंद माने जाते हैं। फिलहाल, ये बीज महंगे होने की वजह से आम किसानों की पहुंच से बाहर हैं, इसलिए अभी इन्हें लैब में ही तैयार कर पूरी तरह से टेस्ट किया जा रहा है।

इस एरोपोनिक्स लैब में करीब 20 तरह की आलू की वैरायटी उगाई जा रही हैं। इनमें एक खास लाल रंग की वैरायटी भी शामिल है, जिसे काफी लाभदायक माना जा रहा है। इसके अलावा, चिप्स और फ्रेंच फ्राइज के लिए इस्तेमाल होने वाली वैरायटी पर भी काम किया जा रहा है, क्योंकि प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में इनकी काफी मांग रहती है। कुछ हल्के गुलाबी रंग की नई वैरायटी भी लगाई गई हैं, जो खाने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं और जिनकी बाजार में अच्छी डिमांड है।

डॉ. तिवारी ने बताया कि अभी रिसर्च का मकसद यह समझना है कि किसानों के लिए कौन-सी वैरायटी ज्यादा फायदेमंद साबित होगी। इसलिए फिलहाल सभी तरह की वैरायटी पर काम किया जा रहा है। किसान सीधे इस तकनीक को अपनाएं तो शुरुआत में लागत ज्यादा हो सकती है और इसे संभालना आसान नहीं होगा। इसी वजह से अभी दो साल तक फील्ड लेवल पर रिसर्च की जाएगी और उसके बाद ही किसानों को ये बीज उपलब्ध कराए जाएंगे

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