खैरलांजी। देवी लिल्हारे
राजस्व विभाग के पोर्टल पर किसानो के प्रकरण दर्ज नही होने को लेकर क्षेत्रीय किसान बहुत परेशान और मजबूर है। किसानो से जुड़े नामांतरण, बंटवारा, खसरा, खतौनी,नकल हो या वह सभी प्रकरण जिनका निपटारा तहसिल कार्यालय से होता है,वह कई-कई दिनो से पेंडिग में रहने को लेकर क्षेत्रीय किसान हताश है। तहसिल क्षेत्रांतर्गत आने वाले 84 गांवो के किसानो की समस्या है कि वह अपना आवेदन लेकर अपने गांवो से बड़ी उम्मीद और आस के साथ आते है कि उन्हे ज्यादा दिनों तक नही भटकना पड़ेगा लेकिन उनके आवेदन को तहसिल कार्यालय में आनलाइन दर्ज ना करते हुए आफलाइन ही रख लिया जाता है। आवेदक किसानो ने बताया कि उन्हें जानकारी के अभाव में वह आवेदन को सीधे तहसिलदार के ही समक्ष पेश कर देते है ताकि उनका समय पर काम हो सके। लेकिन उन्हें पेशी की तारिख देकर उनके प्रकरण में आगे तारिखो पर तारिख चलते रहती है। इसकी असल वजह ये है कि जो आवेदन किसान से लिया जाता है उनके आनलाइन होते ही वह शासन के राजस्व पोर्टल पर दिखने लगता है। जो जिला कलेक्टर से लेकर मुख्य सचिव तक लंबित या निराकरण होने की जानकारी प्रमुखो को भी रहती है। अधिकतर आवेदनो को तहसिल कार्यालय प्रमुख द्वारा आनलाईन दर्ज हो जाने पर निराकरण की समय अवधि में करना होता है। लेकिन आवेदन अगर आफलाईन है तो उस आवेदन को राजस्व विभाग के पोर्टल पर दर्ज नही होने से वह कंही भी नही दिखता है, जिससे तहसिल कार्यालय के कामकाज की वाहवाही भी और काम की ना के बराबर पेंडेंसी होती है। जब तहसिल कार्यालय में किसानों के प्रकरण की मालुमात करने किसान के साथ स्थानीय जनप्रतिनिधि जाते है तो उन्हें साफ्टवेयर में कमी या गड़बड़ी बताकर किसानों के प्रकरण का निपटारा नही होने का हवाला दे दिया जाता है।
*तहसिल कार्यालय की आलमारी और मेजो पर मिल सकते है पेंडिग प्रकरण…*
अभी वर्तमान में चल रहे वर्ष 2026 के अलावा बीते वर्ष 2025 की बात करे तो तब के भी बहुत सारे प्रकरण पेंडिंग होने की जानकारी बताई जा रही है। जिनकी तारिखें तहसिल न्यायालय में चल रही है। यह उन किसानों ने बताया है जिनकी तीन-चार महीनो से पेशी पर लगातार तारिखें हो रही है। हांलांकि भूमि खरीदने वाले किसानों को तीन से चार तारीखे दी जाती है इनमें यह देखना होता है किसान ने जमीने खरीदी है, सिंचित है या असिंचित, किसी तरह का विवाद तो नहीं है, कोई दावा आपत्ति कर्ता तो नही है। नापतौल कब की गई है और पैसा पूूरा मिला या नही। इस तरह के मामलो का निदान होने के बाद ही किसानो का नामांतरण संभव हो पाता है लेकिन उन किसानो को भी भटकता देखा जा सकता है। तहसिल कार्यालय में हर आवेदन के लिए अवधि निर्धारित की गई है। लेकिन तहसिल में समय सीमा में किसानो के लिए कामकाज नहीं किए जा रहे है। इतना ही नही कई बार नामांतरण और खातेदारी प्रकरणों में जानबूझकर गलत जानकारी अपलोड की जाती है जिससे आवेदको को अतिरिक्त खर्चा उठाना पडता है। जंहा किसान डिजीटल व्यवस्था से पारदर्शिता की उम्मीद लगाये बैठे थे। उन्हें अपने प्रकरण के लिए कार्यालयो के चक्कर लगाना पड रहा है। अगर तहसील क्षेत्र के हर किसान को स्थानीय रूप से निराकरण मिल जाता है तो उन्हे अपनी शिकायत लेकर किसी और अधिकारी या जिला कलेक्टर के कार्यालय तक रेंगते हुए नहीं जाना पडेगा। तहसिल की अगर बात करे तो यहां सीमांकन, नामांतरण और बटवारे के अलावा बहुत से ऐसे मामले है जिनकी राजस्व विभाग के आला कमान मैदानी तौर पर जांच करे तो तहसिल कार्यालय की आलमारियो और मेजो पर पुरानी आफलाईन फाईलो का ढेर मिलेगा जिन्हे तहसिल प्रमुख द्वारा आरसीएमएस पोर्टल पर दर्ज नही किया जा रहा है। जब इस संबंध में खैरलांजी तहसिलदार छवि पंत से दूरभाष पर संपर्क किया गया तो उनसे संपर्क नही हो सका।


