श्री रामेश्वरम महादेव के 22वें पाटोत्सव का भव्य शुभारंभ
जबलपुर। ग्वारीघाट स्थित साकेतधाम में श्री रामेश्वरम महादेव के 22वें पाटोत्सव का शुभारंभ आध्यात्मिक वातावरण और संतों के प्रवचनों के साथ हुआ। कार्यक्रम के प्रथम दिवस संत-महात्माओं के ओजस्वी विचारों ने श्रद्धालुओं को भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का संदेश दिया।
मुख्य प्रवक्ता पंडित उमाशंकर जी व्यास ने अपने उद्बोधन में कहा कि सत्संग में वही प्राणी पहुंचता है, जिस पर ईश्वर की कृपा होती है। बिना प्रभु की अनुकंपा के कोई भी जीव सत्संग के मार्ग तक नहीं पहुंच सकता। उन्होंने कहा कि असली संत वही है, जो दूसरों के कल्याण के लिए अपने प्राणों की आहुति देने से भी पीछे नहीं हटता। संत की पहचान वेशभूषा से नहीं, बल्कि उसके चरित्र से होती है। चरित्रवान संत ही समाज को सही दिशा प्रदान करता है।
उन्होंने आगे कहा कि जिस व्यक्ति के पास भक्ति और सत्संग की पूंजी होती है, उसे संसार की कोई भी शक्ति पराजित नहीं कर सकती। भक्ति मनुष्य को आत्मबल देती है और सत्संग जीवन को सकारात्मक दिशा में मोड़ता है।
गुरु ही भगवान और भक्त के बीच सेतु – स्वामी गिरिशानंद
स्वामी गिरिशानंद सरस्वती जी ने कहा कि भगवान की कृपा के बिना सत्संग भी संभव नहीं है। निर्मल मन, निष्कपट भाव और अहंकार रहित व्यक्ति ही ईश्वर की कृपा का पात्र बनता है। गुरु ही भगवान और भक्त के बीच सामंजस्य का केंद्र होता है। गुरु के मार्गदर्शन से ही साधक अपने जीवन में सत्य, संयम और सेवा का मार्ग अपनाता है।
भक्ति और ज्ञान एक-दूसरे के पूरक – स्वामी मुक्तानंद
स्वामी मुक्तानंद जी ने कहा कि भक्ति और ज्ञान में कोई अंतर नहीं है, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। शिव और शक्ति एक ही तत्व के दो रूप हैं। भगवान शिव के तीन नेत्र सूर्य, चंद्रमा और अग्नि हैं, इसी कारण उन्हें त्र्यंबक कहा जाता है। शिव कथा का श्रवण स्वयं शिव की कृपा से ही संभव होता है। यह कथा जीवन में जल की तरह अमृत वर्षा करती है, जिससे आत्मा तृप्त होती है।
त्याग और सत्य से मिलता है संकटों से मुक्ति – बाबा कल्याण दास
बाबा कल्याण दास जी ने कहा कि जो मनुष्य त्याग और सत्य के मर्म को समझकर अपने जीवन में उतार लेता है, वह कभी संकट में नहीं पड़ता। दुख, संघर्ष, बीमारी, लोभ और मोह व्यक्ति के पूर्व कर्मों का परिणाम होते हैं। भगवान शिव का जीवन इस बात का श्रेष्ठ उदाहरण है कि गृहस्थ रहते हुए भी पूर्ण योगी बना जा सकता है। सांसारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए भी शिव पूर्ण ब्रह्मचर्य और संयम का पालन करते हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य जब पशु प्रवृत्तियों से ऊपर उठकर भगवान शिव की शरण में आता है, तो उसकी नकारात्मक प्रवृत्तियों का स्वतः नाश हो जाता है और जीवन में कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
संतों का हुआ भव्य स्वागत
कार्यक्रम में संत-महात्माओं का स्वागत एवं अभिनंदन कैलाश गुप्ता, डॉ. जितेंद्र जामदार, भगवान दास धीरावानी, अशोक रोहाणी, रिंकू ब्रिज, अशोक टेकड़ीवाल, राजेश केडिया, रत्नेश सोनकर, राजीव लोचन त्रिपाठी, मनीष दुबे, मैत्रयी दीदी, अंतु अग्रवाल, पंकज दुबे, रेखा दीदी सहित अन्य श्रद्धालुओं द्वारा किया गया। आर्थिक एवं सामाजिक स्तर पर निशक्त महिलाओं को प्रोत्साहित करते हुए स्वामी गिरिशानंद सरस्वती जी द्वारा 21 सिलाई मशीन बाटी गई।
कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. बृजेश दीक्षित ने किया, जबकि स्वस्तिवाचन पंडित रोहित दुबे एवं पंडित सौरभ दुबे द्वारा संपन्न कराया गया।
पूरे वातावरण में शिव भक्ति, मंत्रोच्चार और श्रद्धा की गूंज रही, जिससे साकेतधाम आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो उठा।


