बंधन से मुक्त कर देता है। आज का मनुष्य परिणाम को लेकर अधिक चिंतित रहता है। विद्यार्थी परीक्षा के परिणाम से, व्यापारी लाभ-हानि से, कर्मचारी पदोन्नति से और परिवार प्रतिष्ठा से चिंतित रहता है। उपरोक्त उद्गार श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय (सांख्य योग) पर आयोजित प्रवचन सत्र में शाम 5:30 बजे से 6:30 तक परमहंस स्वापरमहंस स्वामी गिरिशानन्द सरस्वती जी महाराज ने साकेतधाम गौरीघाट में तृतीय दिवस में व्यक्त किए।
महाराज जी कहते हैं—”तुम्हारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं।” जब हम फल की चिंता छोड़कर कर्तव्य करते हैं, तब मन शांत होता है और सफलता भी अधिक मिलती है। जिस प्रकार किसान बीज बोता है। वह वर्षा को नियंत्रित नहीं कर सकता, लेकिन खेत की तैयारी पूरी निष्ठा से कर सकता है।
महाराज जी कहा कि आज समाज की समस्या यह है कि छोटी-सी प्रशंसा हमें आसमान पर पहुँचा देती है और छोटी-सी आलोचना हमें तोड़ देती है।
जिसका मन भगवान में स्थित हो, वह परिस्थितियों से नहीं डगमगाता। जैसे कछुआ आवश्यकता पड़ने पर अपने अंग भीतर समेट लेता है, वैसे ही बुद्धिमान व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करता है। एक भी अनियंत्रित इन्द्रिय पूरी बुद्धि को बहा सकती है, जैसे तेज हवा नाव को बहा ले जाती है।
इसलिए प्रतिदिन थोड़ा समय जप, ध्यान, स्वाध्याय और सत्संग के लिए अवश्य निकालना चाहिए।
महाराज जी ने गीता का अत्यंत प्रसिद्ध सिद्धांत समझाते हुए कहा कि—
विषय के चिंतन से आसक्ति से कामना से क्रोध से मोह से स्मृति-भ्रंश से बुद्धि का नाश और पतन होता है, कितने परिवार केवल क्रोध और अहंकार के कारण टूट जाते हैं। यदि हम प्रारंभ में ही मन को संभाल लें, तो आगे की पूरी श्रृंखला रुक जाती है।
महाराज श्री का पूजन सर्व श्री दीपा रवि शोरेवाल, प्रणव पाठक, यश व्यास, अमन दुबे, दिलीप चतुर्वेदी, एस के चौरसिया, उमेश पिल्ले, अटल बिहारी, पंकज अग्रवाल, अलभ्य बाजपेयी, भानु नवेरिया, बालकृष्ण अग्रवाल, नलिन पांडेय, रमेश नवेरिया, उमेश नवेरिया, राजेश सोनी, मनीष दुबे आदि ने किया। पूजन पंडित रोहित दुबे, पंडित सौरभ दुबे ने सम्पन्न कराया।


