भारतीय समाज में सूदखोरी कोई नया शब्द नहीं है, लेकिन आज यह एक संगठित, अवैध और खतरनाक धंधे का रूप ले चुकी है। बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों के समानांतर पनपा यह काला कारोबार गरीब, मजदूर, छोटे व्यापारी और किसानों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें कर्ज़ के ऐसे जाल में फँसाता है, जहाँ से निकलना लगभग असंभव हो जाता है।
सूदखोर बिना किसी वैधानिक अनुमति के मोटे ब्याज पर पैसा देते हैं। 5 प्रतिशत मासिक से लेकर 10–15 प्रतिशत तक का ब्याज आम बात हो गई है। समय पर रकम न लौटाने पर मानसिक प्रताड़ना, सामाजिक अपमान, जबरन वसूली और यहां तक कि जान से मारने की धमकियाँ भी दी जाती हैं। कई मामलों में आत्महत्याओं तक की नौबत आ चुकी है, लेकिन विडंबना यह है कि यह अवैध धंधा अब भी खुलेआम फल-फूल रहा है।
सूदखोरी के फैलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण है औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था की जटिलताएँ। गरीब व्यक्ति के लिए बैंक से कर्ज़ लेना आज भी दस्तावेज़ों, गारंटी और लंबी प्रक्रिया का विषय है, जबकि सूदखोर “तुरंत नकद” का लालच देकर उसे फँसा लेते हैं। मजबूरी में लिया गया यही कर्ज़ धीरे-धीरे शोषण का हथियार बन जाता है।
कानूनन सूदखोरी अपराध है। विभिन्न राज्यों में साहूकारी अधिनियम मौजूद हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका क्रियान्वयन बेहद कमजोर है। कई बार सूदखोर राजनीतिक संरक्षण या प्रशासनिक मिलीभगत के कारण कानून से बेखौफ रहते हैं। पीड़ित व्यक्ति डर, बदनामी और दबाव के कारण शिकायत दर्ज कराने से भी कतराता है।
इस समस्या का समाधान केवल पुलिस कार्रवाई से संभव नहीं है। ज़रूरत है कि बैंकिंग प्रणाली को और सरल, सुलभ और भरोसेमंद बनाया जाए। छोटे ऋण, माइक्रो फाइनेंस, स्वयं सहायता समूह और डिजिटल लोन जैसी योजनाओं को ज़मीनी स्तर तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जाए। साथ ही सूदखोरी के खिलाफ सख्त और त्वरित कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
सूदखोरी केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक शोषण का गंभीर रूप है। यदि समय रहते इस अवैध धंधे पर लगाम नहीं लगी, तो यह समाज की जड़ों को खोखला कर देगा। अब ज़रूरत है कि सरकार, प्रशासन और समाज—तीनों मिलकर इस अंधेरे कारोबार के खिलाफ निर्णायक कदम उठाएँ।


