June 23, 2026
सी टाइम्स
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क्या कान बन सकता है स्वास्थ्य का ‘रिमोट कंट्रोल’? ऑरिकुलोथेरेपी पर डॉ. सतीश श्रीवास्तव की खास बातचीत

आज के समय में जब जीवनशैली तेज़ हो चुकी है, तनाव सामान्य हो गया है, स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय लगातार बढ़ रहा है और ध्वनि प्रदूषण हमारे आसपास की नई वास्तविकता बन चुका है, तब शरीर और मन से जुड़ी अनेक समस्याएँ भी तेजी से सामने आ रही हैं। कम सुनाई देनादेनादेनादेना, कानों में आवाज़ आना, गर्दन और कंधों का दर्द, माइग्रेन, चिंता, अनिद्रा, सर्वाइकल की समस्या, घुटनों और कमर का दर्द—ये सब अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहे। नई पीढ़ी भी इन चुनौतियों से दो-चार हो रही है।

ऐसे समय में यदि कोई पद्धति यह दावा करती है कि शरीर के अनेक विकारों को कान के बाहरी हिस्से पर मौजूद विशिष्ट बिंदुओं के माध्यम से प्रभावित किया जा सकता है, तो स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा बढ़ती है। सी टाइम्स के दृष्टिकोण कार्यक्रम में डॉ. सतीश श्रीवास्तव ने जिस विस्तार से ऑरिकुलोथेरेपी पर प्रकाश डाला, उसने इस विषय को केवल एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में नहीं, बल्कि जन-जागरूकता के मुद्दे के रूप में भी सामने रखा है।

ऑरिकुलोथेरेपी का मूल विचार यह है कि कान केवल सुनने का अंग नहीं, बल्कि शरीर के विभिन्न भागों से जुड़े सूक्ष्म संकेतों का एक सक्रिय केंद्र भी है। डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार कान के बाहरी भाग पर 130 से अधिक ऐसे बिंदु हैं, जो शरीर के अलग-अलग अंगों और कार्यप्रणालियों से संबंध रखते हैं। जब शरीर का कोई भाग प्रभावित होता है, तो उससे जुड़ा बिंदु कान में संवेदनशील या सक्रिय हो सकता है। प्रशिक्षित विशेषज्ञ इन बिंदुओं को खोजकर उन्हें उद्दीप्त करते हैं, जिससे तंत्रिका तंत्र के माध्यम से संबंधित भाग तक संदेश पहुंचता है और राहत का अनुभव हो सकता है।

यह अवधारणा आम श्रोता के लिए भले चौंकाने वाली लगे, लेकिन इसमें जो बात सबसे अधिक ध्यान खींचती है, वह है इसका ड्रगलेस, कम जोखिम वाला और सापेक्षतः किफायती होना। ऐसे दौर में जब छोटी-सी तकलीफ भी कई बार लंबी दवा-निर्भरता में बदल जाती है, यह विचार लोगों को आकर्षित करता है कि बिना दवा, बिना इंजेक्शन और बिना जटिल प्रक्रिया के भी राहत का रास्ता खोजा जा सकता है।

हालांकि, किसी भी वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति पर चर्चा करते समय संतुलित दृष्टि आवश्यक है। उत्साह और उम्मीद अपने स्थान पर हैं, लेकिन विवेक उससे भी अधिक जरूरी है। ऑरिकुलोथेरेपी को चमत्कार की तरह प्रस्तुत करना या इसे हर बीमारी का अंतिम समाधान मान लेना उचित नहीं होगा। यह एक सहयोगी चिकित्सा पद्धति हो सकती है, विशेषकर उन समस्याओं में जहां दर्द, तनाव, कार्यात्मक विकार, तंत्रिका-सम्बंधी शिकायतें या पुरानी तकलीफें प्रमुख हों। लेकिन गंभीर रोगों, आपात स्थितियों या जटिल चिकित्सकीय स्थितियों में नियमित और प्रमाणित चिकित्सा पद्धति का स्थान कोई भी विकल्प नहीं ले सकता।

डॉ. सतीश श्रीवास्तव ने बातचीत में यह भी बताया कि यह पद्धति केवल वृद्धों के लिए नहीं, बल्कि युवाओं के लिए भी उपयोगी हो सकती है। आज का युवा लंबे समय तक लैपटॉप, मोबाइल और ईयरफोन के साथ जी रहा है। परिणामस्वरूप गर्दन का दर्द, कंधों की जकड़न, चिंता, माइग्रेन और मानसिक थकान जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। इस संदर्भ में ऑरिकुलोथेरेपी का उल्लेख एक बड़े सामाजिक संकेत की ओर भी इशारा करता है—हमें केवल उपचार की नहीं, बल्कि जीवनशैली सुधार की संस्कृति की भी आवश्यकता है।

इस चर्चा का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिलाओं का स्वास्थ्य भी है। हार्मोनल असंतुलन, दर्द संबंधी विकार, तनाव, त्वचा और पेट से जुड़ी समस्याओं तक में इस पद्धति की संभावनाओं का उल्लेख किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि समाज में स्वास्थ्य जागरूकता को केवल रोग-विशेष तक सीमित नहीं रखा जा सकता। हमें समग्र स्वास्थ्य की भाषा विकसित करनी होगी—ऐसी भाषा जिसमें शरीर, मन, दिनचर्या और वैकल्पिक उपचार सबके बीच संवाद हो।

यह भी सच है कि भारत में ऑरिकुलोथेरेपी जैसी पद्धतियों को लेकर व्यापक जागरूकता अभी नहीं है। इसके पीछे दो कारण हैं—पहला, लोगों तक सही जानकारी का अभाव; दूसरा, वैकल्पिक चिकित्सा के क्षेत्र में मानकीकरण, प्रशिक्षण और वैज्ञानिक संवाद की सीमाएँ। ऐसे में मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किसी पद्धति के बारे में बात हो रही है तो वह जिम्मेदारी के साथ हो—न तो अंध-समर्थन के रूप में, न ही पूर्वाग्रहपूर्ण उपेक्षा के रूप में। जनता को जानकारी मिले, पर साथ में यह समझ भी मिले कि किसी भी उपचार पद्धति का उपयोग प्रशिक्षित मार्गदर्शन और संतुलित अपेक्षाओं के साथ होना चाहिए।

सी टाइम्स के इस संवाद की सबसे मूल्यवान बात यही रही कि इसमें उपचार को केवल व्यवसाय की तरह नहीं, बल्कि सुलभ स्वास्थ्य ज्ञान की तरह प्रस्तुत करने का प्रयास दिखाई दिया। डॉ. श्रीवास्तव ने इसे घर-घर तक पहुंचाने, प्रशिक्षण देने और सीमित लागत पर लोगों तक लाभ पहुंचाने की बात कही। यह सोच सराहनीय है, क्योंकि भारत जैसे देश में स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौती केवल बीमारी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य तक पहुंच भी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि ऑरिकुलोथेरेपी जैसी पद्धतियों पर वैज्ञानिक अध्ययन, सार्वजनिक विमर्श और प्रशिक्षण का दायरा बढ़े। यदि यह वास्तव में लोगों को राहत दे सकती है, तो इसे व्यवस्थित तरीके से समझा और परखा जाना चाहिए। और यदि इसकी सीमाएँ हैं, तो वे भी स्पष्ट रूप से लोगों के सामने रखी जानी चाहिएँ। स्वास्थ्य के क्षेत्र में विश्वास सबसे मूल्यवान पूंजी है, और यह केवल प्रमाण, अनुभव और पारदर्शिता से बनता है।

अंततः, ऑरिकुलोथेरेपी हमें एक बड़ा संदेश देती है—शरीर को केवल बीमारी के बाद याद मत कीजिए, उसे पहले समझिए। हो सकता है हमारे कानों के आसपास मौजूद कुछ बिंदु सचमुच राहत के मार्ग खोलते हों; पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग बनें, सही जानकारी लें और उपचार को एक जिम्मेदार निर्णय की तरह अपनाएँ।

स्वास्थ्य का भविष्य केवल अस्पतालों में नहीं, जागरूकता में भी लिखा जाएगा।

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