(आर्थिक समस्याओं के बाबजूद किया लक्ष्य हासिल) बैहर-:किसी ने कहा है कि खुद ही को कर बुलंद इतना, कि ,खुदा खुद पूछे की बात तेरी रजा क्या है,इस बात को चरितार्थ किया उकवा की बेटी दीपशिखा नरेंद्र मर्सकोले ने,जिसने बहुत ही छोटी आयु में अपने पिता नरेंद्र मर्सकोले को खोया,अचानक पिता के जाने के बाद घर की तीन तीन बेटियों की जिम्मेदारी एकाएक मां के कंधों पर आ गई, और मां न ज्यादा पढ़ी लिखी थी,न कोई जमा पूंजी ,न कोई व्यवसाय था,परन्तु दीपशिखा की मां रंजना ने मेहनत मजदूरी करके अपनी तीनों बेटियों को अच्छी शिक्षा दिला कर अपने पति के अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प लिया , और जहां जैसा काम मिलता उसे कर अपने तीनों बेटियों की जरूरतों को पूरी करती रही,बाद में दीपशिखा की मां ने छात्रावास में अंशकालीन रसोइया की रूप में खाना बनाने का कार्य प्रारंभ किया ,जिसमें बहुत सीमित मानदेय मिलता है,इस अल्प मानदेय में उसने अपने बेटी के हौसले को बरकरार रखा , और अति विषम परिस्थितियों के बाबजूद बेटी ने भी शहर में रहकर अपनी पढ़ाई निरन्तर जारी रखी,दीपशिखा ने अपनी हायर सेकेंडरी तक की शिक्षा उकवा के शासकीय कन्या हायर सेकेंडरी विद्यालय से पूरी कर बालाघाट के जटाशंकर महाविधालय से बीएससी कंप्यूटर साइंस एवं एमए पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विषय से पूर्ण कर मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग द्वारा आयोजित सहायक प्रध्यापक परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया , और जिनका पहले ही प्रयास में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर चयन हुआ,दीपशिखा ने बताया कि जब वह शहर में रहकर अध्ययन कर रही थी,तब एक ही सोच थी कि विधवा मां ने पूरी जवानी हमारे भविष्य को संवारने में लगा दी है,अब मा को आराम देना है, और दिवंगत पिता के साथ साथ मां के अधूरे सपने को पूरा करना है, और दिन रात मेहनत कर लक्ष्य प्राप्ति में अपना सर्वश्य लगा दिया,जब कालेज के सारे बच्चे दिवाली एवं अन्य त्योहारों में अपने घर जाते थे,तब दीपिका अकेले रूम में रहकर पढ़ाई करती थी,क्योंकि उस समय घर आने के लिय भी पास में पर्याप्त पैसे नहीं होते थे, और घर आने जाने में पैसे खर्च न हो इस बात को सोच कर दीपशिखा अकेल अपने कमरे में अध्ययन्न करती थी,जब कभी कोचिंग या अन्य किताबों की आवश्यकता होती थी,तो नानी और मौसी मदद किया करते थे,नानी और मौसी ने हमेशा हौसला और हिम्मत दिया , और समय समय पर मदद भी दिया,पर स्वाभिमानी दीपशिखा कभी भी अपने कारण किसी को कष्ट न हो ये सोचकर हर कार्य को करती थी , और अंततः ईश्वर ने सभी की प्रार्थना और दीपशिखा के अथक मेहनत का प्रतिफल दिया , और पहले ही प्रयास में वह असिस्टेंस प्रोफेसर बनी,जो उकवा क्षेत्र से पहली महिला प्राध्यापक बनी है,जो पूरे उकवा क्षेत्र के लिय अत्यंत गौरव की बात है,दीपसिखा की मां ने कहा कि भले ही मेरी बेटी आज कॉलेज में सहायक प्रध्यापक बन गई है,पर मै निरन्तर रसोइया का कार्य कर बच्चों के मध्य अपनी सेवा दूंगी,क्योंकि इस रसोइया कार्य में भले ही बहुत थोड़ा मिलता था,परन्तु यह थोड़ा ही मेरे विपरीत समय में बहुत काम आया , और मैने जैसे भी करके अपनी बेटी का सहयोग किया, और आज मुझे अत्यंत खुशी है,की मेरी बेटी ने आर्थिक विषमताओं को चीर कर अपने लक्ष्य को हासिल कर हमारे परिवार के साथ गांव को गौरवान्वित किया,साथ ही मेरे पति के सपनों को पूरा किया, दीप शिखा की मां ने कहा कि गांव में आज भी लोग बेटी होने पर दुखी होते है,पर आज मेरी बेटी ऐसे लोगों के लिय एक उदाहरण बनी है,की बेटी भी बेटों से ज्यादा नाम कमा सकती है,एक मा के लिय इससे बड़ा कुछ नहीं हो सकता जब लोग बेटी के नाम से मेरा परिचय दे,दीपशिखा की इस सफलता पर आज उकवा के सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स बारीक,सरपंच रामबती उईके,उपसरपंच शिवशंकर तिवारी, सचिव भजन वल्के,समस्त पंच ग्राम पंचायत उकवा,प्राचार्य सुनिता बोरकर तथा समस्त शिक्षक स्टाफ,श्रमजीवी पत्रकार संघ उकवा के समस्त पदाधिकारियों ,जनपद सदस्य रीता ,जनपद सदस्य धारासिंह मर्सकोले,चाचा सुरेंद्र मर्सकोले,सर्वधर्म सेवा समिति उकवा,जय बड़ा देव एकता समिति के सभी पदाधिकारियों एवं समस्त सदस्यों, सामाजिक जनों एवं अनेक ग्रामीणों ने बेटी को अपनी शुभकामनाएं प्रदान कर उज्ज्वल भविष्य की कामना की है,निश्चित ही दीपशिखा जैसे बेटियां आज भी पुत्र लोभी समाज के लिय एक मिशाल है,


