जबलपुर। नगर निगम सदन में एक बार फिर अनुभवी और वरिष्ठ पार्षदों को एमआईसी (मेयर-इन-काउंसिल) में शामिल न किए जाने का असर साफ तौर पर देखने को मिला। सदन की कार्यवाही के दौरान महापौर को कई मुद्दों पर अकेले ही मोर्चा संभालना पड़ा, जबकि विपक्ष कई बार सत्ता पक्ष पर भारी पड़ता नजर आया।
गौरतलब है कि महापौर चुनाव में कांग्रेस ने जगत बहादुर अन्नू को उम्मीदवार बनाया था, जबकि भाजपा ने डॉ. जितेंद्र जामदार पर दांव खेला था। चुनाव में अन्नू ने जीत हासिल की। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस संगठन से चर्चा कर 10 सदस्यीय एमआईसी का गठन किया, लेकिन कुछ ही महीनों बाद उनके भाजपा में शामिल होने के चलते कांग्रेस की एमआईसी भंग हो गई।
भाजपा में आने के बाद महापौर ने पार्टी नेतृत्व के साथ मिलकर केवल पांच पार्षदों को ही एमआईसी में शामिल किया। हैरानी की बात यह है कि लगभग तीन साल बीत जाने के बाद भी बाकी पांच सदस्यों की नियुक्ति नहीं हो सकी है।
सूत्रों के अनुसार, वर्तमान एमआईसी में शामिल अधिकांश सदस्य पहली बार पार्षद बने हैं और अनुभव की कमी के कारण वे सदन में विपक्ष के आरोपों का प्रभावी जवाब नहीं दे पाते। इसका नतीजा यह होता है कि कई महत्वपूर्ण मौकों पर महापौर को स्वयं ही स्थिति संभालनी पड़ती है।
जानकारी यह भी सामने आई है कि भाजपा में 4–5 ऐसे वरिष्ठ और अनुभवी पार्षद मौजूद हैं जिन्हें एमआईसी में शामिल किया जा सकता था, लेकिन आंतरिक खींचतान के चलते उन्हें मौका नहीं मिला। समय-समय पर शेष पांच सदस्यों की नियुक्ति के संकेत जरूर दिए जाते हैं, लेकिन हर बार यह मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
पिछले लगभग 30 वर्षों में यह पहला अवसर माना जा रहा है जब नगर निगम के गठन के तीन साल बाद भी 10 सदस्यीय एमआईसी अधूरी है और केवल पांच सदस्यों के सहारे काम चलाया जा रहा है। इससे न केवल प्रशासनिक कार्यों की गति प्रभावित हो रही है, बल्कि जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।


