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June 6, 2026
सी टाइम्स
प्रादेशिक

54 वर्षों से संसदीय क्षेत्र की सियासत की धुरी बनी है ‘ पुष्पराजगढ़ की दलवीर कोठी



दलगत राजनीति से ऊपर उठकर हर वर्ष पुण्यतिथि पर उमड़ता है जनसैलाब
दिल्ली से लेकर भोपाल तक गूंजती है इस सियासी गढ़ कीआवाज।
अनूपपुर। विंध्य और मध्य प्रदेश की राजनीति में कई गढ़ बने और ढहे, लेकिन अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ स्थित ‘दलबीर की कोठी’ एक ऐसा सियासी केंद्र है, जिसकी चमक पिछले 54 वर्षों से फीकी नहीं पड़ी। आदिवासी अंचल के सबसे प्रतिष्ठित और रसूखदार राजनीतिक परिवारों में शुमार स्वर्गीय दलबीर सिंह, उनकी पत्नी स्वर्गीय राजेश नंदिनी सिंह और अब उनकी सुपुत्री सांसद हिमाद्री सिंह ने तीन पीढ़ियों से क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है। इस पुश्तैनी आदिवासी परिवार के पास समृद्ध जमीनी विरासत तो पहले से थी, लेकिन दलबीर सिंह के केंद्रीय राजनीति में बढ़ते कद के साथ यह कोठी अंचल की सत्ता का सबसे बड़ा पावर सेंटर बन गई। आज भी चाहे भाजपा हो या कांग्रेस, या फिर शासन-प्रशासन के गलियारे, इस चौखट पर आकर हर दल के नेता और बड़े प्रशासनिक अधिकारी अपनी हाजिरी दर्ज कराना गौरव की बात समझते हैं।

निर्दलीय जीत से शुरू हुआ सियासी सफर

वर्ष 1972 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस परिवार की राजनैतिक धुरी स्थापित हुई थी। मूल रूप से कांग्रेसी विचारधारा के होने के बावजूद, तत्कालीन राजनीतिक समीकरणों के चलते दलबीर सिंह ने पुष्पराजगढ़ (ST) सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा। उन्होंने बड़े-बड़े राजनैतिक दलों के दिग्गजों को हराकर अपनी जमीनी ताकत का अहसास कराया और पहली बार विधायक बने। इसके बाद वे राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हुए। यह वह दौर था जब पूरे शहडोल जिले में अब संभाग में कमला प्रसाद और दलबीर सिंह जैसे चंद कद्दावर नेताओं का ही सिक्का चलता था।

दिल्ली में बढ़ा कद और कोठी का विस्तार

वर्ष 1980 में जब दलबीर सिंह शहडोल लोकसभा सीट से पहली बार कांग्रेस की टिकट पर सांसद चुनकर दिल्ली पहुंचे, तो उनकी कोठी का स्वरूप भी व्यापक होने लगा। इसके बाद वे 1984 और फिर 1991 में लगातार भारी मतों से जीतकर संसद पहुंचे। इस दौरान राजीव गांधी से लेकर पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकारों में उनका जलजला और रसूख दिल्ली तक देखा गया। उन्होंने केंद्रीय शहरी विकास राज्य मंत्री और केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री जैसे भारी-भरकम विभागों की जिम्मेदारी संभाली, जिसने शहडोल को देश के नक्शे पर एक नई पहचान दी।

राजेश नंदिनी ने संभाली पति की विरासत

वर्ष 2000 में पूर्व केंद्रीय मंत्री दलबीर सिंह के असमय निधन के बाद अंचल की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया था। तब जनता और कांग्रेस पार्टी के भारी आग्रह पर उनकी धर्मपत्नी राजेश नंदिनी सिंह ने घरेलू दहलीज से बाहर निकलकर जमीनी राजनीति संभाली। उन्होंने 1993 से 1998 तक जिले के कोतमा विधानसभा से कांग्रेस विधायक के रूप में क्षेत्र की सेवा की। इसके बाद वर्ष 2009 के आम चुनाव में वे शहडोल संसदीय सीट से 15वीं लोकसभा की सांसद चुनी गईं। यद्यपि वे सरकार में मंत्री नहीं रहीं, लेकिन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और कई संसदीय समितियों में उनका खासा दबदबा रहा।

असमय विदाई और उप-चुनाव की कसौटी

इस परिवार के लिए वर्ष 2016 बेहद भावुक और उथल-पुथल भरा रहा। 8 मई 2016 को 59 वर्ष की आयु में राजेश नंदिनी सिंह का शहडोल में अचानक दिल का दौरा पड़ने से आकस्मिक निधन हो गया। उनके निधन के ठीक 6 महीने बाद, नवंबर 2016 में हुए शहडोल लोकसभा के उप-चुनाव में उनकी बेटी हिमाद्री सिंह को कांग्रेस की टिकट पर उतरना पड़ा। पिता को महज 12 वर्ष की उम्र में खोने वाली हिमाद्री यह पहला चुनाव बेहद कम अंतर से हार गईं, लेकिन उन्होंने जनता के बीच रहकर संघर्ष जारी रखा।

हिमाद्री सिंह के नाम ऐतिहासिक रिकॉर्ड

बाद में राजनीतिक समीकरण बदले और हिमाद्री सिंह भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गईं। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की टिकट पर उन्होंने 4 लाख से अधिक वोटों के ऐतिहासिक अंतर से जीत दर्ज की। इसके बाद 2024 के आम चुनाव में भी भाजपा ने उन पर भरोसा जताया और वे दोबारा लगातार सांसद चुनी गईं। इसके साथ ही इस परिवार के नाम एक अनूठा और दुर्लभ रिकॉर्ड दर्ज हो गया, जहां एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों—पिता, माता और अब बेटी—ने संसद सदस्य बनकर शहडोल की आवाज को दिल्ली तक पहुंचाया है।

2 जून को दलगत राजनीति से परे आस्था

2 जून की तिथि एक बार फिर इस कोठी के ऐतिहासिक महत्व को बयां कर रही है। हर साल की तरह इस बार भी स्वर्गीय दलबीर सिंह की पुण्यतिथि पर बिना किसी निमंत्रण, बिना किसी राजनैतिक झंडे या बैनर के सैकड़ों की संख्या में लोग पुष्पराजगढ़ पहुंचे। यह इस कोठी की तासीर ही है कि यहाँ भाजपा से कहीं ज्यादा कांग्रेस के पुराने और वरिष्ठ पदाधिकारी व कार्यकर्ता अपनी आस्था जताने पहुंचते हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ (जो कभी एक हुआ करते थे) के प्रशासनिक गलियारों से लेकर दिल्ली तक फैले इस परिवार के शुभचिंतक अधिकारी-कर्मचारी आज भी इन्हें ‘विकास पुरुष’ के रूप में याद करते हैं। कई राजनीतिक विश्लेषकों ने समय-समय पर दावे किए कि अब इस परिवार की राजनीति खत्म हो गई, लेकिन हर बार सियासत घूम-फिरकर इसी कोठी के इर्द-गिर्द सिमट आती है। भले ही आज हिमाद्री सिंह भाजपा की सांसद हैं, लेकिन उनकी विरासत और दबदबे का लोहा भोपाल से लेकर दिल्ली तक हर कोई मानता है।

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