_रिसॉर्ट निर्माण का विरोध, टपरी दुकानदारों के भविष्य पर मंडराया संकट; ग्रामीण बोले—’ग्राम पंचायत की जमीन हमें वापस दो’_
सिवनी- जिले की ग्राम पंचायत मोहगांव सड़क में स्थित शासकीय घास मद की भूमि को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। ग्राम पंचायत, सरपंच और बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर खसरा क्रमांक 209, रकबा 3.00 हेक्टेयर की शासकीय भूमि ग्राम पंचायत को वापस दिलाने की मांग की है। ग्रामीणों का आरोप है कि यह भूमि वर्ष 2015 में केवल ट्रांसपोर्ट नगर एवं कॉम्प्लेक्स निर्माण के उद्देश्य से एनएचआई सद्भावना कंपनी को आवंटित की गई थी, लेकिन आज तक उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं हुई।
ग्रामीणों का कहना है कि अब इसी भूमि पर किसी निजी कंपनी द्वारा रिसॉर्ट निर्माण की तैयारी की जा रही है, जिसका ग्राम पंचायत और क्षेत्र के लोग खुलकर विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि ग्राम पंचायत की सहमति के बिना इस तरह का उपयोग स्वीकार्य नहीं है।
*लीज की भूमि पर स्वामित्व कैसे बना? उठ रहे गंभीर सवाल*
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिस शासकीय भूमि को निर्धारित उद्देश्य के लिए लीज पर दिया गया था, वह वर्ष 2020 के बाद अचानक एनएचआई के नाम भूमि स्वामी के रूप में कैसे दर्ज हो गई? ग्रामीणों का कहना है कि यह विषय जांच का है और प्रशासन को पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
दुकानदारों को नोटिस से बढ़ी चिंता
ग्रामीणों ने ज्ञापन में यह भी मांग की है कि भूमि पर वर्षों से छोटे-छोटे व्यवसाय कर रहे दुकानदारों को दिए गए नोटिस तत्काल निरस्त किए जाएं। उनका कहना है कि इन टपरी और छोटी दुकानों से कई गरीब परिवारों का जीवन-यापन चलता है। यदि उन्हें हटाया गया तो अनेक परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा।
*ग्रामीणों की मांग—कॉम्प्लेक्स बने, पंचायत को मिले आय*
ज्ञापन में मांग की गई है कि यदि ट्रांसपोर्ट नगर की अब आवश्यकता नहीं है तो उक्त भूमि ग्राम पंचायत को वापस सौंपी जाए। ग्राम पंचायत अपने स्तर पर वहां व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स विकसित कर सकती है, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा और पंचायत की आय में भी वृद्धि होगी।
ग्रामीणों ने कलेक्टर से पूरे प्रकरण की जांच कर शासकीय भूमि के आवंटन, स्वामित्व परिवर्तन और वर्तमान उपयोग की वैधानिक स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। उनका कहना है कि पंचायत की भूमि पर निजी हितों को बढ़ावा देने के बजाय स्थानीय लोगों के हितों और आजीविका को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


