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मैं भी बनूंगा कान्हा जैसा,
जग में प्रेम बढ़ाऊंगा,
धरा मगन हो जाएगी ये,
जमकर धूम मचाऊंगा।
मैं भी बनूंगा कान्हा …
बंशी की एक धुन पर सारी,
गैय्या दौड़ी आएंगी,
भर-भर मटकी माखन-मिसरी,
मन-भर सभी खिलाएंगी।
मैं भी बनूंगा कान्हा ..
कहीं कदंब के पेड़ भी होंगे,
और कहीं यमुना की कल-कल ,
ध्यान धरा जो कान्हा का तो,
मुस्काएंगे वो पल-पल।
मैं भी बनूंगा कान्हा …
ठोकर खाकर जब-भी गिरूंगा,
मैया दौड़ी आएगी,
बाहों में भर लेगी फिर वो,
मन भर प्रेम जताएंगी।
मैं भी बनूंगा कान्हा …
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कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
गांधीनगर इन्दौर (म.प्र.)


