नई दिल्ली/मुंबई। हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन दिनों ‘एक देश, एक चुनाव’ की खूब चर्चा होती है, लेकिन अपराध और सियासत की अंदरूनी गलियों को देखें तो एक और कड़वा सवाल तेजी से सिर उठा रहा है। क्या सरकार ने परोक्ष रूप से ‘एक देश, एक गैंगस्टर’ की नीति अपना ली है? यह सवाल किसी सनक से नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत और साबरमती जेल की सलाखों के पीछे से चल रहे उस खौफनाक खेल से पैदा हुआ है, जिसे पूरा देश खुली आंखों से देख रहा है। अंडरवर्ल्ड के पुराने दौर में जब दाऊद इब्राहिम का नाम गूंजता था, तो लोग कहते थे कि उसे सीमा पार का संरक्षण है। आज साबरमती जेल में बंद लॉरेंस बिश्नोई की तूती जिस तरह से बोल रही है, लोग उसकी तुलना सीधे तौर पर दाऊद के उसी आतंक से करने लगे हैं।
हैरानी की बात यह है कि जेल की चारदीवारी, चौबीसों घंटे की कड़ी सुरक्षा और तमाम आधुनिक निगरानी तंत्र के बावजूद लॉरेंस का सिंडिकेट देशभर में रंगदारी, धमकियों और हत्याओं का कारोबार बेरोकटोक चला रहा है। मुंबई में पूर्व मंत्री बाबा सिद्दीकी की सरेआम हत्या हो या फिर फिल्म जगत से जुड़ी हस्तियों के आवास पर लगातार गोलियां बरसाने का दुस्साहस—हर जगह लॉरेंस गैंग का नाम डंके की चोट पर सामने आता है। यह आम नागरिक की समझ से परे है कि बिना किसी ऊंचे राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के कोई कैदी जेल को ही अपना सबसे सुरक्षित मुख्यालय कैसे बना सकता है? विरोधी या तो ढेर या जेल में, मगर लॉरेंस का नेटवर्क क्यों अछूता?
विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों का यह संदेह बेबुनियाद नहीं है कि सिस्टम के भीतर कहीं न कहीं एक खास गिरोह को लेकर नरमी बरती जा रही है। इस पूरी तस्वीर का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि लॉरेंस के जितने भी धुर विरोधी हैं, वे एक-एक करके या तो मुठभेड़ों में मारे जा रहे हैं या फिर कानून के शिकंजे में कसते चले जा रहे हैं।
हाल ही में अमेरिका के लास वेगास से हिमांशु भाऊ की गिरफ्तारी की खबर आई, जिसे एफबीआई ने दबोच लिया। हिमांशु भाऊ लॉरेंस के विरोधी गिरोह का मुख्य चेहरा माना जाता था। इसके अलावा भी लॉरेंस के कई विरोधी या तो रास्ते से हटा दिए गए या विदेशी एजेंसियों के जरिए जेलों में ठूंस दिए गए। लेकिन दूसरी तरफ लॉरेंस के अपने मुख्य सिंडिकेट की रीढ़ आज भी जस की तस खड़ी है। यदि उसके गिरोह का कोई प्यादा कभी पकड़ा भी जाता है, तो उससे मुख्य नेटवर्क पर कोई आंच नहीं आती। इसी विरोधाभास ने इस धारणा को हवा दी है कि मानो अपराध जगत में भी एक ही गिरोह का एकाधिकार (मोनोपॉली) स्थापित करने की मूक सहमति दे दी गई हो।
‘एक जिला, एक माफिया’ से लेकर ‘एक देश, एक गैंगस्टर’ तक का सफर ,अपराध के इसी संगठित स्वरूप को लेकर उत्तर प्रदेश में भी तीखी बहस छिड़ गई है। कांग्रेस ने योगी आदित्यनाथ सरकार पर सीधा वार करते हुए आरोप लगाया है कि राज्य में ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ओडीओपी) की तर्ज पर दरअसल ‘एक जिला, एक माफिया’ मॉडल गढ़ा गया है। कांग्रेस प्रवक्ताओं का कहना है कि सत्ता ने अपराध को खत्म नहीं किया, बल्कि उसे अपनी सुविधानुसार संरक्षण देकर एक खास जाति और वर्ग के बाहुबलियों को अभयदान दे दिया है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि रोजाना हत्या, बलात्कार, अपहरण और हिंसक वारदातों का जो तांडव चल रहा है, उस पर देश की शीर्ष अदालत और उच्च न्यायालय तक ने खाकी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जब स्थानीय स्तर पर ‘एक जिला, एक माफिया’ की नीति चलती है, तो वही व्यवस्था राष्ट्रीय स्तर पर फैलकर ‘एक देश, एक गैंगस्टर’ का रूप ले लेती है।
अपराध समाचार के एक्सपर्ट के नजरिए से देखें तो कानून का राज कभी भी चयनात्मक (सिलेक्टिव) नहीं हो सकता। किसी एक गिरोह के खात्मे के लिए दूसरे गिरोह को आंख मूंदकर फलने-फूलने देना या फिर जेल की सलाखों को उसके लिए सुरक्षित किला बना देना लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के साथ सबसे बड़ा मजाक है। जब सत्ताधारी मंचों से ‘अपराधियों को दूसरे लोक भेजने’ की गर्जना करते हैं, तब जनता उनसे यही पूछती है कि यह गर्जना केवल कमजोर और विरोधी अपराधियों के लिए ही क्यों है? साबरमती जेल से फैलते आतंक के इस जाल पर पूर्ण विराम कब लगेगा? अगर समय रहते इस सिंडिकेट की डोर नहीं काटी गई, तो इतिहास यही दर्ज करेगा कि सत्ता ने अपनी सुविधा के लिए कानून के राज को गिरोह तंत्र के हाथों गिरवी रख दिया था।


