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पान पर भी टैक्स है,जलपान पर भी टैक्स,
होटलों में जाएं , दस्तरख़्वान (खाने)पर भी टैक्स !
पहले थी गुरु- दक्षिणा, जो मन करे दे दो ,
हो गया बाक़ायदा अब ज्ञान पर भी टैक्स!
(एज़ूकेशन )
आय पर भी टैक्स है ,और राय पर भी टैक्स ,
मंदिरों में जाइए, भगवान पर भी टैक्स !
प्यास (बिसलेरी) पर भी टैक्स है,
आकाश पर (सैटेलाइट कम्युनिकेशन यथा इंटरनेट इत्यादि) भी टैक्स ,
वायुयानों में अधिक सामान पर भी टैक्स !
रोड पर भी टैक्स है और टोल पर भी टैक्स ,
सुलभ शौचालय में है , स्नान पर भी टैक्स !
मूल पर भी टैक्स है और ब्याज़ पर भी टैक्स ,
अब लगेगा दूसरी संतान पर भी टैक्स !
दान देना , दीजिए, पर गुप्त ही रखिए ,
चौंकिएगा मत ,लगे गर दान पर भी टैक्स !
घर बनाना पहले ही मुश्किल का था इक काम,
अब बढ़ेगा घरों के निर्माण पर भी टैक्स !
*शलभ* लिखते ग़ज़ल दिल से ,फिर भी डरते हैं,
लग न जाए, इस *दिले-नादान* पर भी टैक्स !
लेखक – राजेश अरोरा शलभ, लखनऊ


