June 13, 2026
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युद्धक्षेत्र में बढ़त हासिल करने में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम निभाएगा अहम भूमिका : एक्सपर्ट्स


नई दिल्ली, 18 जनवरी  इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम, पारंपरिक युद्धक्षेत्र के साथ-साथ युद्ध का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभरा है और ‘सेंस, सिक्योर एंड स्ट्राइक’ का एसएसएस मंत्र इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में बढ़त हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह जानकारी एक्सपर्ट्स की ओर से दी गई।

राष्ट्रीय राजधानी में ‘डीईएससीओएम 2026’ को संबोधित करते हुए, मुख्य अतिथि एकीकृत रक्षा स्टाफ (नीति योजना और बल विकास) मुख्यालय आईडीएस के उप प्रमुख वाइस एडमिरल विनीत मैककार्टी, एवीएसएम ने कहा कि आधुनिक युद्ध डिजिटल टेक्नोलॉजी, ऑटोनॉमस सिस्टम, एआई और नेटवर्क और संचालन में तीव्र प्रगति से प्रेरित एक बदलाव से गुजर रहा है।

उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा, “इसके मूल में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम है जिसके बारे में हम सभी आज बात कर रहे हैं और यह भूमि, वायु, समुद्र, साइबर और अंतरिक्ष जैसे पारंपरिक युद्ध क्षेत्रों के साथ-साथ युद्ध के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरा है।”

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम अब केवल एक सहायक कारक नहीं रह गया है; भविष्य के संघर्षों के तेज, अधिक जटिल और अधिक प्रतिस्पर्धी होने के साथ, ये युद्धक्षेत्र में बढ़त हासिल करने के लिए निर्णायक कारक हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि रक्षा बलों को अपनी परिचालन श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए स्पेक्ट्रम की आवश्यकता का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान जैमिंग और जीपीएस स्पूफिंग में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध का व्यापक रूप से उपयोग किया गया था। एडवांस इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता भविष्य में सफलता सुनिश्चित कर सकती है।

भारतीय सेना के सिग्नल कोर के सिग्नल ऑफिसर-इन-चीफ और कर्नल कमांडेंट लेफ्टिनेंट जनरल विवेक डोगरा, एसएम के अनुसार, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने यह साबित कर दिया है कि कोई भी क्षेत्र सीमित नहीं है।

डोगरा ने कहा, “इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम ने सीमाओं को मिटा दिया है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान, दोहरे उपयोग वाली वाणिज्यिक तकनीक ने नागरिक और सैन्य स्पेक्ट्रम के बीच की रेखाओं को धुंधला कर दिया है।”

पीएचडीसीसीआई रक्षा एवं एचएलएस समिति के अध्यक्ष अशोक अटुलुरी ने कहा कि प्रतिभा, क्षमता या धन की कोई कमी नहीं है।

उन्होंने कहा, “हमें बस आगे बढ़ने और भारत में ही तकनीकी रूप से उन्नत युद्ध प्रणालियों को डिजाइन, विकसित और निर्मित करने की इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। सरकार द्वारा शुरू किए गए नए आरडीआई (अनुसंधान, विकास एवं नवाचार) कोष के माध्यम से पहले ही काफी डीप-टेक फंडिंग की जा चुकी है।”

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