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June 20, 2026
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अमेरिका में करियर छोड़ नागेश कुकूनूर ने चुना सिनेमा, इंजीनियर से फिल्ममेकर बनकर सच किया सपना



मुंबई, 29 मार्च । कहते हैं कि सपने अगर पैशन बन जाएं, तो वह पूरे होकर ही रहते हैं। कुछ लोग अपने पैशन के पीछे सब कुछ छोड़ने की हिम्मत जुटा पाते हैं। नागेश कुकूनूर उन्हीं लोगों में से एक हैं, जिन्होंने एक सफल इंजीनियर की नौकरी छोड़कर फिल्मी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। आज वह हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा फिल्मकारों में गिने जाते हैं, जिनकी फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को सोचने पर मजबूर करती हैं।

नागेश कुकूनूर का जन्म 30 मार्च 1967 को हैदराबाद में हुआ था। बचपन से ही उन्हें फिल्मों का बहुत शौक था। वह अपने घर के पास सिनेमाघरों में जाकर तेलुगु और हिंदी फिल्में देखा करते थे। पढ़ाई में अच्छे होने के कारण उन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद वह अमेरिका चले गए, जहां उन्होंने जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल की।

पढ़ाई पूरी करने के बाद नागेश ने अमेरिका में एनवायरनमेंटल कंसल्टेंट के तौर पर काम करना शुरू किया। उनकी नौकरी अच्छी थी और जिंदगी आराम से चल रही थी, लेकिन उनका सपना सिनेमा में आकर काम करने का था। यही कारण था कि नौकरी के साथ-साथ उन्होंने फिल्म से जुड़े वर्कशॉप्स में हिस्सा लेना शुरू किया और अभिनय और निर्देशन सीखा। धीरे-धीरे उनका यह शौक जुनून में बदल गया।

इसके बाद वह भारत लौट आए और उन्होंने अपने इंजीनियरिंग करियर से कमाए पैसों को फिल्मों में लगा दिया। साल 1998 में उन्होंने ‘हैदराबाद ब्लूज’ बनाई। इस फिल्म की कहानी उन्होंने खुद लिखी, निर्देशन किया और उसमें अभिनय भी किया। कम बजट में बनी यह फिल्म बड़ी हिट साबित हुई और उन्हें इंडस्ट्री में अलग पहचान दिलाई।

इसके बाद नागेश ने कई अलग तरह की फिल्में बनाईं। साल 2003 में आई ‘तीन दीवारें’ को काफी सराहना मिली, और इसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ कहानी का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला। लेकिन असली सफलता उन्हें साल 2005 में आई ‘इकबाल’ से मिली। यह फिल्म एक मूक-बधिर लड़के की कहानी है, जो क्रिकेटर बनने का सपना देखता है। इस फिल्म ने लोगों के दिलों को छू लिया।

इसके बाद उन्होंने ‘डोर’, ‘आशाएं’, ‘लक्ष्मी’ और ‘धनक’ जैसी कई बेहतरीन फिल्में बनाईं। उनकी फिल्मों की खासियत यह रही कि वे हमेशा समाज के अलग-अलग मुद्दों को सरल और भावनात्मक तरीके से दिखाते हैं। ‘लक्ष्मी’ जैसी फिल्म ने समाज के कड़वे सच को सामने रखा, जबकि ‘धनक’ ने बच्चों के सपनों और उम्मीदों को खूबसूरती से दिखाया।

नागेश कुकूनूर को उनके काम के लिए कई बड़े पुरस्कार भी मिले हैं। ‘इकबाल’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला, वहीं ‘धनक’ को सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इसके अलावा ‘लक्ष्मी’ को अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में सम्मान मिला।

अगर उनके जीवन की बात करें, तो नागेश कुकूनूर आज भी इंडस्ट्री में सक्रिय हैं और फिल्मों और वेब सीरीज के जरिए लोगों तक संदेश पहुंचा रहे हैं।

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