जबलपुर। मध्यप्रदेश स्टेट बार काउंसिल के 12 मई को प्रस्तावित चुनाव से पहले बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। कुल 138 उम्मीदवारों में से 19 के नामांकन फॉर्म निरस्त कर दिए गए हैं, जिससे अधिवक्ता जगत में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। मामला अब सीधे Supreme Court of India तक पहुँच गया है, जहां सोमवार को इस पर अहम सुनवाई होगी और इन उम्मीदवारों के भविष्य का फैसला तय होगा।
बार काउंसिल के अनुसार नामांकन निरस्त करने के पीछे अलग-अलग कारण बताए गए हैं। कुछ उम्मीदवार पहले से बार एसोसिएशन में पदाधिकारी होने के कारण अयोग्य पाए गए, जबकि कुछ पर अनुशासनात्मक प्रकरण लंबित हैं और कुछ के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। जबलपुर के भी चार प्रमुख नाम इस कार्रवाई की जद में आए हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर विवाद और गहरा गया है।
नामांकन खारिज होने के बाद हाईकोर्ट परिसर में माहौल गरमा गया। मप्र हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डी.के. जैन और अन्य पदाधिकारियों ने संयुक्त रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर निर्वाचन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। जैन ने इस कार्रवाई को सोची-समझी साजिश बताते हुए आरोप लगाया कि कुछ लोग नहीं चाहते कि वे चुनाव जीतकर स्टेट बार तक पहुँचें, क्योंकि इससे कई मामलों की पोल खुल सकती थी। उन्होंने यह भी कहा कि जिस नियम के आधार पर नामांकन रद्द किए गए हैं, वह 2016 से लागू है, लेकिन अब तक कभी इस तरह लागू नहीं किया गया।
उधर, उम्मीदवार मनीष मिश्रा ने भी चुनाव प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा करते हुए मतदाता सूची में भारी गड़बड़ी का आरोप लगाया। उनका कहना है कि प्रदेश के लगभग 1.52 लाख वकीलों में से केवल 85 हजार को ही वोटर लिस्ट में शामिल किया गया है, जो चुनाव की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पहले जिन नामांकनों को वैध बताया गया, उन्हें बाद में निरस्त कर दिया गया, और नैतिक आधार पर निर्वाचन समिति से इस्तीफे की मांग की।
इन आरोपों के बीच विशेष समिति के सचिव प्रशांत दुबे ने सफाई देते हुए कहा कि पूरी कार्रवाई जस्टिस धूलिया कमेटी की सिफारिशों के अनुसार की गई है और ये निर्देश देशभर में बाध्यकारी हैं। उनका कहना है कि नियमों का पालन करते हुए ही यह निर्णय लिया गया है।
इसी बीच Bar Council of India ने मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने के बाद नई कमेटी गठित कर महाधिवक्ता प्रशांत सिंह को अध्यक्ष नियुक्त किया है। उन्होंने पदभार भी संभाल लिया है, जिससे अब चुनावी प्रक्रिया की जिम्मेदारी नई व्यवस्था के हाथों में आ गई है।
अब पूरे मामले पर सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी है। सोमवार को होने वाला फैसला यह तय करेगा कि निरस्त किए गए नामांकन बहाल होंगे या फिर चुनाव इसी स्थिति में आगे बढ़ेगा। फिलहाल इतना तय है कि यह चुनाव अब सामान्य प्रक्रिया न रहकर एक बड़ी कानूनी लड़ाई का रूप ले चुका है।


