शेषनारायण राठौर
अनूपपुर । देश की राजनीति में महिला सशक्तिकरण एक प्रमुख विमर्श के रूप में लगातार उभरता रहा है, लेकिन इसके व्यावहारिक पक्ष पर गंभीर सवाल भी खड़े होते रहे हैं। यह धारणा कि महिलाओं के लिए आरक्षण लागू होने मात्र से व्यापक सामाजिक बदलाव आ जाएगा, कई मायनों में अधूरी प्रतीत होती है।
अक्सर देखा गया है कि संसद और विधानसभाओं में पहुंचने वाली महिलाओं का बड़ा वर्ग राजनीतिक परिवारों से आता है । इससे यह सवाल उठता है कि क्या सामान्य पृष्ठभूमि की महिलाओं को वास्तव में समान अवसर मिल पा रहे हैं, या राजनीतिक पहुंच अभी भी सीमित वर्ग तक ही सिमटी हुई है।
महिला आरक्षण को लेकर यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि 33% आरक्षण का सिद्धांत पहले ही स्वीकृत हो चुका है। हाल में जिस विधेयक को लेकर चर्चा रही। उसका मुख्य उद्देश्य लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करना था, न कि महिला आरक्षण को सीधे प्रभावित करना। ऐसे में यह मान लेना कि इस बिल के पारित न होने से महिला आरक्षण पर कोई तात्कालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं ठहरता।
हालांकि, एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या केवल सीटों की संख्या बढ़ाने से लोकतंत्र अधिक मजबूत होगा, या इससे सरकारी खर्च और प्रशासनिक बोझ ही बढ़ेगा? जब देश में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों में अभी भी अपेक्षित स्तर की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तब प्राथमिकताओं का संतुलन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
वास्तविक महिला सशक्तिकरण की दिशा शायद आरक्षण से आगे जाकर सोचने में है। यदि सरकार सच में महिलाओं की स्थिति सुधारना चाहती है, तो उसे शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं को सार्वभौमिक और सुलभ बनाना होगा बिना जाति, वर्ग या क्षेत्र के भेदभाव के।
अंततः सवाल यह नहीं है कि आरक्षण होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हमारे नीतिगत कदम समाज के उस बड़े वर्ग तक पहुंच पा रहे हैं, जो वास्तव में परिवर्तन का इंतजार कर रहा है। जब तक नीति का लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचेगा, तब तक सशक्तिकरण अधूरा ही रहेगा।


