अनूपपुर, दिनांक 24.04.2026।
आज माननीय मंडल प्रबंधक राकेश रंजन के अनूपपुर रेलवे स्टेशन निरीक्षण के दौरान एक बात खास तौर पर चर्चा का विषय बन गई,वह थी पत्रकारों से बनाई गई दूरी। निरीक्षण तो हुआ, व्यवस्थाओं का जायजा भी लिया गया, लेकिन जमीनी हकीकत सामने रखने वाले पत्रकारों से संवाद की कड़ी जैसे जानबूझकर कमजोर कर दी गई।अनूपपुर जिले के पत्रकार हमेशा से रेलवे से जुड़ी समस्याओं को सजगता और निर्भीकता के साथ उठाते रहे हैं। चाहे प्लेटफॉर्म की अव्यवस्थाएं हों, ट्रेनों की लेटलतीफी, यात्री सुविधाओं की कमी या स्थानीय यात्रियों की परेशानियां,इन मुद्दों को बिना किसी लाग-लपेट के प्रशासन तक पहुंचाने का काम पत्रकारों ने बखूबी निभाया है। यही नहीं, वे केवल समस्याएं उजागर करने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनके समाधान तक पहुंचने का भी निरंतर प्रयास करते रहे हैं।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यही सजगता और स्पष्टता अब असहजता का कारण बन रही है? क्या समस्याओं को खुलकर सामने रखने की आदत ही पत्रकारों को संवाद से दूर रखने की वजह बन गई?
रेलवे प्रशासन का यह रुख कहीं न कहीं पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। निरीक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह जाए और जमीनी आवाजों को अनसुना कर दिया जाए, तो सुधार की उम्मीदें भी अधूरी ही रह जाती हैं।
जरूरत इस बात की है कि संवाद के दरवाजे बंद करने के बजाय उन्हें और खोला जाए, ताकि समस्याएं सामने आएं और उनका ठोस समाधान निकल सके। क्योंकि विकास की असली तस्वीर वही होती है, जिसमें सवाल पूछने वालों की आवाज को भी बराबर महत्व दिया जाए।संवाद से दूरी नहीं, समाधान से नजदीकी ही बेहतर प्रशासन की पहचान होती है।


