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June 27, 2026
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मर्जी से साथ रहे, बच्चा पैदा किया… फिर ब्रेकअप पर रेप कैसे?’ लिव-इन रिलेशनशिप पर SC का तीखा सवाल

नई दिल्ली 28 April, लिव-इन रिलेशनशिप और उसमें सहमति से बने शारीरिक संबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और बड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर कोई कपल बिना शादी किए अपनी मर्जी से लंबे समय तक साथ रहता है और बाद में किसी वजह से उनके रास्ते अलग हो जाते हैं, तो इसे रेप का मामला नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की एकमात्र महिला जज जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने शादी का झांसा देकर रेप करने का आरोप लगाने वाली एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सख्त बात कही। इस मामले में महिला और आरोपी लंबे समय से लिव-इन में रह रहे थे और उनका एक बच्चा भी है।

बिना शादी के साथ रहने का फैसला क्यों किया?

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने याचिकाकर्ता महिला से तीखा सवाल किया कि आखिर उसने शादी से पहले आरोपी के साथ रहने का फैसला क्यों किया था। जज ने यह भी स्पष्ट किया कि कोर्ट द्वारा ऐसे सवाल पूछने पर अक्सर ‘विक्टिम शेमिंग’ (पीड़िता को ही दोषी ठहराने) का आरोप लगा दिया जाता है, लेकिन लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों की सच्चाई और परिस्थितियों की गहराई को समझने के लिए ऐसे सवाल पूछना बेहद जरूरी हो जाता है। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि महिला 18 साल की उम्र में विधवा हो गई थी और जब वह आरोपी के संपर्क में आई, तो उसने शादी का वादा करके उसे अपने साथ रखा। महिला को बहुत बाद में पता चला कि वह व्यक्ति पहले से ही शादीशुदा है। इस पर अदालत ने पूछा कि यह बात छिपाए जाने के बावजूद महिला ने उसके साथ रहकर बच्चा पैदा करने का विकल्प क्यों चुना।

सहमति से बने संबंध टूटने पर आपराधिक मामला नहीं बनता

जस्टिस नागरत्ना ने मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर संबंध पूरी तरह से दोनों की सहमति से बने थे और कपल ने लंबे समय तक एक साथ जीवन बिताया है, तो ब्रेकअप होने पर इसे अचानक आपराधिक मामला करार नहीं दिया जा सकता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लिव-इन रिलेशनशिप में अक्सर ऐसी स्थिति देखने को मिलती है जहां रिश्ता खत्म होने के बाद महिला की तरफ से रेप का आरोप लगा दिया जाता है। जब महिला के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि उस व्यक्ति की पहले से चार पत्नियां हैं और वह औरतों का शोषण करता है, तो कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि उन्हें दूसरी महिलाओं से नहीं, बल्कि सिर्फ याचिकाकर्ता से मतलब है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब रिश्ता आपसी मर्जी से था और उससे एक बच्चा भी है, तो अब रिश्ता टूटने पर इसे रेप कैसे कहा जा सकता है।

हमें हमदर्दी है कि उसे बेवकूफ बनाया गया, लेकिन यही रिस्क है

सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप के जोखिमों को उजागर करते हुए कहा कि शादी के बाहर पनपने वाले रिश्तों में अक्सर ऐसी अजीबोगरीब स्थितियां पैदा हो जाती हैं। अदालत ने महिला के प्रति अपनी सहानुभूति जताते हुए कहा कि उसे इस बात का खेद है कि याचिकाकर्ता को बेवकूफ बनाया गया। कोर्ट ने समझाया कि अगर वह महिला कानूनी रूप से शादीशुदा होती, तो उसके अधिकार कहीं अधिक सुरक्षित और बेहतर होते और वह गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) के लिए दावा कर सकती थी। कोर्ट ने कहा कि क्योंकि यहां शादी का कोई ठोस बंधन नहीं था और दोनों सिर्फ साथ रह रहे थे, तो इसमें हमेशा एक रिस्क शामिल होता है। अगर वह व्यक्ति अलग हो जाता है, तो सिर्फ अलग होने की वजह से यह कोई आपराधिक कृत्य नहीं बन जाता।

 

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