चिरंजीवी भगवान परशुराम का जहाँ पूरा देश धूमधाम से जन्मोउत्सव मना रहा है वही संस्कारधानी जबलपुर में भी भगवान परशुराम जन्मोउत्सव को लेकर जगह जगह अयोजन किये जा रहे है वही अगर हम बात करे भगवान परशुराम की तो आपको बता दे की जबलपुर से भगवान परशूरराम का गहरा नाता है जबलपुर उनकी तपोस्थली है वही पनागर विधानसभा में आने वाले मटामार गाँव की पहाड़ियों की चोटी पर ऐसा स्थान है जहाँ पर भगवान परशुराम ने तपस्या की थी और उनको लगा श्राप का पश्चताप भी भगवान परशुराम ने इसी स्थान पर करते हुए पाताल में समा गए थे,
अद्भुत और अविश्वसनीय इस स्थान पर जहां अनादि काल से पहाड़ो पर स्तिथ 31 फिट की भगवान परशुराम की प्रतिमा जो कही से भी देखी जा सकती है अदभुत प्रतीत होती है,जो गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज है
वही पहाड़ो के पास बना परशुराम कुंड जहाँ परशूरराम ने इसी कुंड में श्राप का पश्चताप कर पाताल में समा गए थे,वही अनादि काल का बना यह कुंड का रहस्य भी अदभुत है कहा जाता है की इस कुंड की गहराई को आज तक कोई भी नही माप पाया,
जहाँ साल इस स्थान में साल में दो बार मेले का आयोजन होता है तो आज के दिन भगवान परशुराम के जन्मोउत्सव पर इस स्थान पर विभिन्न आयोजन किये जाते है।
वही इस स्थान पर रहने वाले संत महन्तानन्द ने इस स्थान की महिमा और रहस्य को लेकर काफी जानकारी acn भारत की टीम को दी जहा संत महन्तानन्द ने बताया की अनादि काल से यह स्थान पवित्र माना गया इसी स्थान पर भगवान परशूरराम ने भगवान शंकर की तपस्या की थी लेकिन तपस्या के दौरान जब भगवान परशुराम के पिता ने अपनी पत्नी से जलपात्र में पानी लाने को कहा और देर हो जाने के चलते भगवान परशुराम को पिता ने गुस्से में आकर भगवान परशुराम को आदेश कर अपनी माँ का सिर काटने को कहा तब भगवान परशुराम ने अपनी माँ का सिर धड़ से अलग कर दिया जिसके बाद भगवान परशूरराम ने पश्चताप और किये गए पाप को लेकर वह नर्मदा में परिक्रमा और स्नान कर पश्चताप करने जाया करते थे
जिसके बाद भगवन परशूरराम नित्य इस स्थान से नर्मदा में स्नान करने जाया करते थे जहां एक बार माता नर्मदा ने परशुराम से कहा की इतनी दूर से तुम रोज यहाँ आते हो तुम वापस जाओ मैं तुम्हे स्थान पर आती हु,
उसके बाद स्वयं मा नर्मदा ने परशुराम कुंड में भगवान परशुराम जी को दर्शन दिए,जिसके बाद भगवान परशुराम उसी कुंड में समाहित हो गए,जिनके आज इस स्थान पर कई जगह भगवान परशुराम के पद चिन्ह दिखाई देते है।जो शाश्त्रो और इतिहास ने आज भी दर्ज है।
जहाँ परशुराम जन्मोउत्सव पर इस पवित्र स्थान पर दूर दराज के इलाकों से भक्त भगवान परशुराम के दर्शन करने आते है और कुंड में स्नान कर पुण्यलाभ हासिल करते है।


