मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में बाघ हमलों की घटनाओं ने एक बार फिर जंगल से लगे गांवों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। अलग-अलग बाघ हमलों में दो महिलाओं की मौत के बाद ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है। इन घटनाओं ने मानव-वन्यजीव संघर्ष और वन विभाग की निगरानी व्यवस्था को फिर सवालों के घेरे में ला दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस साल मानव मौतों का आंकड़ा 21 तक पहुंच गया है। इनमें कुछ मौतें बेहद कम समय के भीतर हुई हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में भय और असुरक्षा की स्थिति और गहरी हो गई है। जंगल से सटे गांवों में रहने वाले लोगों के लिए खेतों, जंगल किनारे रास्तों और रोजमर्रा की गतिविधियों में खतरा बढ़ता नजर आ रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बाघों की बढ़ती आवाजाही और इंसानी बस्तियों के पास वन्यजीवों की मौजूदगी ने सामान्य जीवन को प्रभावित कर दिया है। ग्रामीण अब खेतों में जाने और जंगल किनारे आवाजाही करने से भी डर रहे हैं।
दो महिलाओं की मौत के बाद वन विभाग और प्रशासन से निगरानी बढ़ाने, प्रभावित गांवों में अलर्ट सिस्टम मजबूत करने और सुरक्षा उपायों को प्रभावी बनाने की मांग उठ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि केवल घटना के बाद कार्रवाई करने के बजाय स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, जंगलों के आसपास बढ़ती मानवीय गतिविधियां, वन्यजीवों के प्राकृतिक क्षेत्रों में दबाव और गांवों की भौगोलिक स्थिति मानव-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ाने वाले बड़े कारण हैं। ऐसे में निगरानी, जागरूकता और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र बेहद जरूरी हो जाता है।
सिवनी की इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष अब केवल वन विभाग की चुनौती नहीं, बल्कि ग्रामीण सुरक्षा, आजीविका और प्रशासनिक समन्वय से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है।


