November 6, 2026
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राष्ट्रीय

इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश निर्माण के बाद हालात को ‘गलत तरीके से संभाला’: असम के मुख्यमंत्री

गुवाहाटी, 11 मई : असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने रविवार को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने 1971 में पाकिस्तान पर भारत की ऐतिहासिक जीत के बाद बने बांग्लादेश के संदर्भ में हालात को ठीक से नहीं संभाला।

एक्स (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए सरमा ने दावा किया कि उस समय की राजनीतिक नेतृत्व ने उस ऐतिहासिक अवसर का लाभ नहीं उठाया। यह बयान ऐसे समय में आया है जब कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की, खासकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बाद जिसमें कहा गया कि अमेरिका की मध्यस्थता के बाद भारत और पाकिस्तान ने “पूर्ण और तत्काल युद्धविराम” पर सहमति जताई है।

भारत और पाकिस्तान के बीच इस समझौते में भूमि, वायु और समुद्री मोर्चों पर सभी सैन्य कार्रवाइयों को तुरंत रोकने की बात शामिल है। विपक्षी नेताओं ने पीएम मोदी की रणनीति की तुलना इंदिरा गांधी द्वारा 1971 के भारत-पाक युद्ध को संभालने के तरीके से की है।

सरमा ने अपनी पोस्ट को शीर्षक दिया: **’बांग्लादेश निर्माण की मिथक कथा: एक रणनीतिक विजय, एक कूटनीतिक चूक’**।

उन्होंने लिखा, “भारत की 1971 की सैन्य जीत निर्णायक और ऐतिहासिक थी। इसने पाकिस्तान को दो हिस्सों में बांट दिया और बांग्लादेश को जन्म दिया। लेकिन जहां हमारे सैनिकों ने युद्धभूमि पर शानदार सफलता दिलाई, वहीं राजनीतिक नेतृत्व स्थायी रणनीतिक लाभ सुनिश्चित नहीं कर सका।”

सरमा ने कहा कि बांग्लादेश का निर्माण अक्सर कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जाता है, लेकिन इतिहास इससे अलग कहानी कहता है।

उन्होंने आगे लिखा, “1971 की सैन्य विजय के बावजूद रणनीतिक दृष्टिकोण की कमी रही। जो एक नया क्षेत्रीय समीकरण बन सकता था, वह एकतरफा उदारता में बदल गया। अगर आज श्रीमती इंदिरा गांधी जीवित होतीं, तो देश उनसे यह पूछता कि सशस्त्र बलों द्वारा प्राप्त इस निर्णायक विजय को उन्होंने क्यों गंवाया। बांग्लादेश का निर्माण कोई सौदा नहीं था — यह एक ऐतिहासिक अवसर था जो खो गया।”

अपनी बात को साबित करने के लिए सरमा ने छह बिंदु रखे। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश का निर्माण एक धर्मनिरपेक्ष वादा था, लेकिन अब वह एक “इस्लामी सच्चाई” बन चुका है।

“भारत ने एक धर्मनिरपेक्ष बांग्लादेश का समर्थन किया था। लेकिन 1988 तक इस्लाम को वहां की राज्य धर्म घोषित कर दिया गया। आज ढाका में राजनीतिक इस्लाम का बोलबाला है, जो उन मूल्यों को कमजोर करता है जिनकी रक्षा के लिए भारत ने संघर्ष किया था।”

हिंदुओं के कथित उत्पीड़न पर बोलते हुए सरमा ने कहा कि पहले बांग्लादेश की आबादी में अल्पसंख्यक समुदाय का हिस्सा 20 प्रतिशत था, जो अब घटकर 8 प्रतिशत से कम रह गया है। उन्होंने इसे ‘व्यवस्थित भेदभाव और हिंसा’ का परिणाम बताया, जिसे भारत ने काफी हद तक नजरअंदाज किया।

उन्होंने लिखा, “चिकन नेक असुरक्षित रह गया… भारत की सैन्य श्रेष्ठता के बावजूद सिलिगुड़ी कॉरिडोर की भौगोलिक कमजोरी को हल नहीं किया गया। अगर उत्तर बांग्लादेश के ज़रिए एक सुरक्षित ज़मीनी मार्ग तय होता, तो पूर्वोत्तर भारत मुख्य भारत से बेहतर ढंग से जुड़ सकता था — लेकिन ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया।”

अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर सरमा ने कहा कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की वापसी का कोई समझौता नहीं हुआ, जिसका नतीजा यह हुआ कि “असम, बंगाल और पूर्वोत्तर में जनसंख्या संबंधी असंतुलन पैदा हुआ और इससे सामाजिक तनाव और राजनीतिक अस्थिरता आई।”

उन्होंने यह भी दावा किया कि भारत को चटगांव पोर्ट तक रणनीतिक पहुंच नहीं मिली, और पांच दशक बाद भी पूर्वोत्तर भारत भू-आबद्ध (लैंडलॉक्ड) ही है।

सरमा ने आरोप लगाया कि बांग्लादेश ने कई दशकों तक भारत विरोधी उग्रवादियों को पनाह दी और 1971 के बाद भारत ने जो रणनीतिक खालीपन छोड़ा, उसका भरपूर फायदा उठाया गया।

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