November 5, 2026
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पराली जलाने पर किसानों को दोष देने से पहले सरकार पराली प्रबंधन का आर्थिक विकल्प दे – किसान गर्जना संगठन

प्रेस विज्ञप्ति


पराली को कचरा नहीं, किसान की अतिरिक्त आय का साधन बनाए सरकार; ₹2,000 प्रति एकड़ तक सहायता और पराली की सरकारी खरीद की मांग।
बालाघाट। धान की कटाई के बाद खेतों में बचने वाली पराली आज किसानों के सामने एक बड़ी आर्थिक समस्या बनती जा रही है। हार्वेस्टर से धान कटवाने के बाद पराली को काटने, इकट्ठा करने, गांठ बनाने, खेत से बाहर निकालने और परिवहन करने में किसानों को भारी खर्च उठाना पड़ता है। एक तरफ सरकार पराली नहीं जलाने की अपील करती है, वहीं दूसरी तरफ उसके उचित प्रबंधन के लिए किसानों को पर्याप्त आर्थिक सहयोग और बाजार उपलब्ध नहीं कराया जाता।

इस गंभीर विषय को लेकर किसान गर्जना संगठन ने मध्यप्रदेश सरकार के सामने एक विस्तृत परियोजना प्रस्ताव तैयार किया है। संगठन की मांग है कि प्रदेश में मुख्यमंत्री पराली प्रबंधन एवं किसान आर्थिक प्रोत्साहन योजना लागू की जाए, जिससे पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान हो और किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी न पड़े।

किसान गर्जना संगठन के प्रदेश अध्यक्ष अरविंद चौधरी ने कहा कि किसान पर्यावरण का दुश्मन नहीं है। किसान भी चाहता है कि खेत की मिट्टी की उर्वरक शक्ति बनी रहे, वातावरण प्रदूषित न हो और पशुओं को पर्याप्त चारा मिले। लेकिन पराली का प्रबंधन करने का पूरा खर्च किसान पर डाल देना उचित नहीं है। सरकार को किसानों को दंडित करने के बजाय आर्थिक सहायता और उचित विकल्प उपलब्ध कराने चाहिए।

संगठन की सरकार से प्रमुख मांगें

1. ₹2,000 प्रति एकड़ तक आर्थिक सहायता: पराली काटने, इकट्ठा करने, गांठ बनाने, लोडिंग और परिवहन के लिए किसानों को ₹2,000 प्रति एकड़ तक सीधे बैंक खाते में सहायता दी जाए।

2. पराली की सरकारी खरीद: सरकार पराली का न्यूनतम खरीद मूल्य निर्धारित करे, ताकि किसान अपनी पराली बेचकर अतिरिक्त आमदनी प्राप्त कर सके।

3. प्रत्येक ग्राम पंचायत में संग्रहण केंद्र: ग्राम पंचायत अथवा गांवों के समूह में पराली संग्रहण केंद्र बनाए जाएं, जहां किसान अपनी पराली जमा कर सकें।

4. मशीनों पर 50 से 80 प्रतिशत तक अनुदान: बेलर, रेक, मल्चर, स्ट्रॉ चॉपर और अन्य पराली प्रबंधन मशीनों पर पात्रता के अनुसार अनुदान दिया जाए तथा गांवों में मशीन बैंक स्थापित किए जाएं।

5. पशुओं के चारे के रूप में उपयोग: पराली को गांठ बनाकर गौशालाओं, डेयरी संचालकों और पशुपालकों तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाए। वैज्ञानिक तरीके से उपचारित पराली से पशु आहार तैयार करने की इकाइयां स्थापित हों।

6. खेत की उर्वरक शक्ति बचाने की व्यवस्था: किसानों को पराली खेत में मिलाने, जैविक खाद बनाने और डीकंपोजर के उपयोग के लिए मशीनरी एवं तकनीकी सहायता दी जाए।

7. बालाघाट एवं सिवनी में पायलट प्रोजेक्ट: प्रथम चरण में दोनों धान उत्पादक जिलों में 50 हजार एकड़ क्षेत्र को शामिल करते हुए ₹10 करोड़ की प्रत्यक्ष किसान सहायता का प्रस्ताव लागू किया जाए।

महाराष्ट्र और केंद्र सरकार की योजनाओं का दिया आधार

संगठन ने अपने प्रस्ताव में भारत सरकार की फसल अवशेष प्रबंधन योजना 2024, कृषि मशीनरी पर अनुदान, कस्टम हायरिंग सेंटर, धान स्ट्रॉ सप्लाई चेन तथा महाराष्ट्र सरकार की कृषि यंत्रीकरण व्यवस्था को आधार बनाया है। मध्यप्रदेश कृषि अभियांत्रिकी संचालनालय की वर्ष 2026-27 की धान स्ट्रॉ सप्लाई चेन संबंधी पहल को भी आगे बढ़ाने की मांग की गई है।

अरविंद चौधरी ने कहा कि सरकार को यह समझना होगा कि पराली केवल खेत में बचा हुआ अवशेष नहीं है, बल्कि इससे पशुओं के लिए चारा, जैविक खाद और ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

किसान गर्जना संगठन की सरकार से स्पष्ट मांग है कि पराली जलाने पर कार्रवाई करने से पहले किसानों को आर्थिक विकल्प, मशीनरी, खरीद केंद्र और परिवहन की सुविधा उपलब्ध कराई जाए। किसान पराली का प्रबंधन करने को तैयार है, लेकिन उसका आर्थिक बोझ अकेले उठाने को तैयार नहीं है।

संगठन ने मुख्यमंत्री एवं कृषि मंत्री से मांग की है कि इस प्रस्ताव पर तत्काल उच्चस्तरीय बैठक बुलाकर बजट और प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान की जाए तथा आगामी धान कटाई के मौसम से पहले योजना लागू करने की घोषणा की जाए।

किसान गर्जना संगठन का संकल्प:

पराली नहीं जलेगी, किसान की आय बढ़ेगी।
खेत की उर्वरक शक्ति बचेगी, पशुओं को चारा मिलेगा।
पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा और किसान भी आर्थिक रूप से मजबूत होगा।

जारीकर्ता:
किसान गर्जना संगठन, मध्यप्रदेश
अरविंद चौधरी
प्रदेश अध्यक्ष

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