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April 19, 2026
सी टाइम्स
अंतरराष्ट्रीय

बलूचिस्तान में पाकिस्तान का नियंत्रण सहमति नहीं, बल्कि जबरदस्ती पर आधारित: रिपोर्ट



कोलंबो, 18 अप्रैल । बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी की घटनाएं केवल मानवाधिकार का मुद्दा नहीं रह गई हैं, बल्कि यह पाकिस्तान के नियंत्रण तंत्र की विफलता को भी उजागर करती हैं। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य द्वारा अपनाए गए कड़े उपाय अब उसकी कमजोरी और भय को दर्शाने लगे हैं।



श्रीलंका गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, बलूचिस्तान में “गायब कर देना” अब सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि शासन का एक तरीका बन गया है। यह डर की भाषा बन चुकी है और कई परिवारों के लिए राज्य का सबसे कठोर चेहरा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कई मामलों में युवक कॉलेज के लिए घर से निकलते हैं और वापस नहीं लौटते, या सुरक्षा चौकियों से उठाए जाने के बाद लापता हो जाते हैं। कई बार कुछ दिनों बाद शव मिलते हैं, जिन पर हिरासत में रहने के संकेत होते हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर कोई जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की जाती।

रिपोर्ट के अनुसार, अब यह संकट एक सीमित मानवाधिकार मुद्दा नहीं रहा, बल्कि बलूचिस्तान की राजनीति के केंद्र में आ गया है, जिससे राज्य की छवि, विरोध के तरीके और पूरे संघर्ष की प्रकृति प्रभावित हो रही है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि 1948 में पाकिस्तान में शामिल किए जाने के बाद से ही बलूचिस्तान को एक “संसाधन क्षेत्र” की तरह देखा गया है, जहां बार-बार सैन्य अभियान, राजनीतिक दमन और प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद व्यापक गरीबी देखने को मिलती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना, इंटर-सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (आईएसआई) और नागरिक प्रशासन मिलकर ऐसा नियंत्रण तंत्र चला रहे हैं, जो सहमति के बजाय जबरदस्ती पर आधारित है।

इस तंत्र का सबसे कड़ा हथियार “जबरन गुमशुदगी” है। वर्षों से बलूच परिवार आरोप लगाते रहे हैं कि लोगों को घरों, हॉस्टलों या सुरक्षा चौकियों से उठाया जाता है और वे एक ऐसे तंत्र में गायब हो जाते हैं, जहां से उनकी कोई जानकारी नहीं मिलती।

इसके बाद विरोध-प्रदर्शन, प्रेस क्लब के बाहर धरने, राष्ट्रीय राजमार्गों पर बैठकर प्रदर्शन और अदालतों में याचिकाएं दायर करने का सिलसिला शुरू होता है, लेकिन अक्सर इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। कई माताएं अपने लापता परिजनों की तस्वीरें लेकर न्याय की मांग करती रहती हैं।

रिपोर्ट में पांक के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि 2025 में 1,355 जबरन गुमशुदगी और 225 न्यायेतर हत्याओं के मामले सामने आए। 2026 में भी यह सिलसिला जारी है, जहां जनवरी में 82 और फरवरी में 109 लोगों के लापता होने की बात कही गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, ये आंकड़े भले ही कार्यकर्ताओं के हों, लेकिन ये एक व्यापक और लगातार चल रही व्यवस्था की ओर इशारा करते हैं, जहां गुप्त हिरासत से लेकर कथित “किल एंड डंप” जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं।

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