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April 22, 2026
सी टाइम्स
प्रादेशिक

राजस्थान की पूर्व सीएम के वायरल पत्र मामले में कानूनी दांवपेंच तेज



जबलपुर हाईकोर्ट पहुंचा मामला
जबलपुर। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के नाम पर सोशल मीडिया पर प्रसारित एक कथित पत्र के मामले में कांग्रेस आईटी सेल के तीन सदस्यों की गिरफ्तारी का विवाद अब जबलपुर हाईकोर्ट पहुंच गया है। इस प्रकरण में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई है, जिस पर मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ विचार करेगी।

याचिका में गिरफ्तारी की वैधता पर उठाए सवाल
अधिवक्ताओं के माध्यम से कोर्ट में प्रस्तुत इस याचिका में निखिल, बिलाल और इनाम की हिरासत को विधि विरुद्ध करार दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पुलिस ने बिना किसी ठोस आधार के यह कार्रवाई की है। उल्लेखित पत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर टिप्पणी की गई थी, जिसे बाद में संबंधित पक्ष द्वारा फर्जी घोषित कर दिया गया। इसी आधार पर भोपाल साइबर पुलिस ने आईटी सेल से जुड़े इन कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया था। वर्तमान याचिका में राज्य सरकार के साथ ही भोपाल पुलिस अधीक्षक और साइबर पुलिस को प्रतिवादी बनाया गया है।

पुलिस कार्रवाई का घटनाक्रम
इस पूरे घटनाक्रम में यह तथ्य सामने आया है कि संबंधित पत्र 15-16 अप्रैल से ही सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध था और बड़ी संख्या में लोगों द्वारा साझा किया जा रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री ने 18 अप्रैल की शाम लगभग 8 बजे इसे फर्जी बताते हुए एक पोस्ट साझा की थी। इसके तत्काल बाद पुलिस ने सक्रियता दिखाते हुए कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पकड़ा। कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि जिस सामग्री को लाखों लोग पहले ही देख चुके थे, उसके लिए केवल चुनिंदा लोगों को जिम्मेदार ठहराना प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण है।

हिरासत की अवधि, वैधानिक प्रक्रिया का विरोध
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और विधि विशेषज्ञों ने पुलिस की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया है। राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने इस कार्रवाई को पूरी तरह गैरकानूनी बताया है। उनके अनुसार कार्यकर्ताओं को लगभग 30 घंटों तक बिना किसी पर्याप्त कारण के साइबर सेल की हिरासत में रखा गया। विरोध स्वरूप यह दलील दी गई है कि जब कोई जानकारी पहले से ही जनमानस के बीच संचरण में हो, तो उसे साझा करने मात्र पर की गई गिरफ्तारी नागरिक अधिकारों का उल्लंघन है। इसी आधार पर अब उच्च न्यायालय से राहत की अपेक्षा की गई है।

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