September 16, 2026
सी टाइम्स
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राष्ट्रपति मुर्मु ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने के लिए मंजूरी दी

नई दिल्ली, 17 मई । देश की न्याय व्यवस्था को और मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने को मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति ने ‘सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026’ जारी किया है, जिसके तहत अब सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी गई है। इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया शामिल नहीं होंगे। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के बढ़ते बोझ को कम करना और लोगों को तेजी से न्याय दिलाना है। माना जा रहा है कि जजों की संख्या बढ़ने से मामलों की सुनवाई में तेजी आएगी और लंबे समय से लंबित केसों का निपटारा जल्दी हो सकेगा। केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इसकी जानकारी शेयर की।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने ‘सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956’ में संशोधन करते हुए जजों की संख्या बढ़ाने वाले अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। यह अध्यादेश केंद्र सरकार के उस फैसले के कुछ ही दिनों बाद आया, जिसमें केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सुप्रीम कोर्ट में चार नए जजों के पद बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इससे पहले 5 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में ‘सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026’ को संसद में पेश करने का फैसला लिया गया था। सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में लगातार बढ़ते कामकाज और लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए यह कदम जरूरी हो गया था।

नए जजों की नियुक्ति से अदालत की कार्यक्षमता बढ़ेगी और सुनवाई में हो रही देरी को कम करने में मदद मिलेगी। भारत में सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या बढ़ाने से जुड़ा पहला कानून वर्ष 1956 में बनाया गया था। इसके बाद समय-समय पर न्यायपालिका की बढ़ती जरूरतों के अनुसार जजों की संख्या में बदलाव किया जाता रहा है। इससे पहले वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या 30 से बढ़ाकर 33 की गई थी। अब नए अध्यादेश के बाद सुप्रीम कोर्ट में कुल स्वीकृत जजों की संख्या, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सहित, 38 हो जाएगी। इसे देश की न्यायिक व्यवस्था को और मजबूत करने तथा लोगों को समय पर न्याय उपलब्ध कराने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

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