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May 29, 2026
सी टाइम्स
प्रादेशिक

जनजातीय समुदाय को गुमराह कर आंदोलन की आड़ में 15 लाख कमाना निंदनीय कार्य- मोरध्वज पैकरा, कार्य परिषद सदस्य आईजीएनटीयु


अमरकंटक । जिला अनूपपुर (म.प्र.), दिनांक 29 मई 2026। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक की कार्य परिषद के सदस्य तथा भाजयुमो प्रदेश मंत्री तथा एबीवीपी के पूर्व विभाग संगठन मंत्री मोरध्वज पैकरा ने विश्वविद्यालय परिसर में हाल ही में तथाकथित आंदोलन की आड़ में जनजातीय समुदाय को गुमराह किए जाने तथा कथित रूप से लगभग 15 लाख रुपये की वित्तीय वसूली किए जाने की घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे जनजातीय समाज के विश्वास, सरलता एवं श्रद्धा के साथ किया गया गंभीर विश्वासघात बताते हुए कहा कि यह केवल एक विश्वविद्यालय का आंतरिक प्रकरण नहीं, बल्कि समूचे जनजातीय समाज की अस्मिता से जुड़ा गंभीर विषय है, जिस पर समय रहते सजग होना आवश्यक है।
*शॉर्ट अटेंडेंस को जातिगत जोड़कर गलत तथ्यों को समाज के सामने लाया गया*
श्री पैकरा ने बताया कि वर्तमान विवाद का मूल विषय उपस्थिति (शॉर्ट अटेंडेंस) से संबंधित एक सामान्य प्रशासनिक मामला था। आंतरिक परीक्षा में सम्मिलित न होकर, विश्वविद्यालय के नियमों के विरुद्ध जबरन उत्तीर्ण किए जाने हेतु प्रशासन पर दबाव बनाने का प्रयास किया गया, जो किसी भी शैक्षणिक संस्थान की नियम-व्यवस्था के विरुद्ध है। सबसे चिंताजनक यह है कि इस वास्तविक तथ्य को छिपाकर, जनजातीय बंधुओं को भ्रामक जानकारी देकर आंदोलन में सम्मिलित किया गया, जिससे एक सामान्य प्रशासनिक विषय को अनावश्यक रूप से सामाजिक रंग दे दिया गया। श्री पैकरा ने जनहित में इस प्रकरण के प्रमुख तथ्य स्पष्ट करते हुए कहा कि वास्तविक मामला केवल उपस्थिति में कमी का था, परंतु इसे आंदोलन का रंग देकर जनजातीय समाज को असली तथ्य नहीं बताया गया।
*आदिवासी छात्र संगठन में गाँवों से बुज़ुर्ग जनजातीय भाई-बहनों को बुलाना सार्वजनिक धोखा है*
ज्ञापन ‘आदिवासी छात्र संगठन’ के नाम से प्रस्तुत किया गया, किंतु आंदोलन में छात्रों के स्थान पर गाँवों से बुज़ुर्ग जनजातीय भाई-बहनों को बुलाया गया, जो उनके सम्मान के विरुद्ध है। अनूपपुर एवं आसपास के जिलों से जनजातीय बंधुओं को गलत जानकारी देकर चिलचिलाती धूप में बुलाया गया, जिससे उन्हें शारीरिक एवं मानसिक कष्ट उठाना पड़ा। किसी भी समाज के बुज़ुर्ग उसका सम्मान एवं आधार होते हैं, और उन्हें इस प्रकार भ्रमित कर कष्ट में डालना अत्यंत निंदनीय है। वाहन बुकिंग सहित विभिन्न मदों के नाम पर कथित रूप से बड़ी राशि एकत्र किए जाने की शिकायत है, जबकि बुलाए गए लोगों को समुचित सुविधा तक नहीं दी गई। सत्य को सामने लाने तथा जनजातीय समाज को भविष्य में ऐसे छल से बचाने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री से विषय रखा जाएगा।
*यह आंदोलन नहीं, जनजातीय आस्था का सौदा है*
श्री पैकरा ने आरोप लगाया कि आंदोलन के आयोजकों द्वारा कथित रूप से लगभग 15 लाख रुपये की राशि एकत्र की गई। जनजातीय बंधुओं को गाँवों से लाने के लिए स्कॉर्पियो, बोलेरो आदि वाहन बुक कराने के नाम पर मोटी राशि ली गई, परंतु जिन्हें बुलाया गया उन्हें न समुचित सुविधा दी गई, न उचित व्यय-भत्ता। ज्ञापन ‘आदिवासी छात्र संगठन’ के नाम पर दिया गया, किंतु आंदोलन में छात्रों के स्थान पर गाँवों से बुज़ुर्ग जनजातीय भाई-बहनों को चिलचिलाती धूप में बुलाया गया, जिससे उन्हें शारीरिक एवं मानसिक कष्ट उठाना पड़ा। उन्होंने कहा कि यह विरोधाभास स्वयं आंदोलन की मंशा पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यह आंदोलन नहीं, हमारे भोले-भाले समाज की आस्था का सौदा है। जो लोग जनजातीय भावनाओं को मोहरा बनाकर लाखों रुपये की कमाई करते हैं, वे किसी भी रूप में हमारे हितैषी नहीं हो सकते. एकत्र की गई राशि का हिसाब सार्वजनिक रूप से सामने आना चाहिए, और जिस निष्पक्ष जांच की माँग की गई है, उससे पूरा सच उजागर होगा।
*जनजातीय समाज को बाँटने के षड्यंत्र पर चिंता*
कार्य परिषद सदस्य ने सबसे बड़ी चिंता जनजातीय समाज को आपस में बाँटने के प्रयासों पर व्यक्त की। उन्होंने कहा कि कुछ निहित स्वार्थी तत्व जाति, धर्म एवं क्षेत्र के नाम पर समाज में दरार डालकर अपने राजनीतिक एवं आर्थिक हित साधना चाहते हैं। उन्होंने सितंबर 2025 में परिसर के सभागार से जुड़े विवादास्पद प्रकरण का भी उल्लेख किया, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विभाजन की राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान अंततः उसी समाज को होता है जिसे विभाजित किया जाता है। जनजातीय विवि में पढ़ाई को बाधित कर आंदोलन की राजनीति करने की प्रवृत्ति सबसे अधिक हानि जनजातीय विद्यार्थियों को ही पहुँचाती है, क्योंकि उनके लिए शिक्षा ही प्रगति का सबसे बड़ा मार्ग है। यदि परीक्षा एवं नियमों के स्थान पर दबाव एवं धरने को मान्यता दी जाने लगे, तो इसका सबसे बुरा प्रभाव उन्हीं विद्यार्थियों पर पड़ेगा जो ईमानदारी से परिश्रम कर रहे हैं। इसलिए विश्वविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था एवं अनुशासन की रक्षा स्वयं जनजातीय समाज के दीर्घकालिक हित में है।
*सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के नेतृत्व में जांच हेतु विषय कार्यपरिषद् में रखा जाएगा*
श्री पैकरा ने बताया की इस संपूर्ण प्रकरण की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कराई जाएगी, यथासंभव किसी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के नेतृत्व में, ताकि जांच पूर्णतः निष्पक्ष एवं विश्वसनीय रहे। जनजातीय समुदाय को वास्तविक तथ्यों से अवगत कराने हेतु विश्वविद्यालय से तथ्यात्मक स्पष्टीकरण (श्वेत-पत्र) सार्वजनिक रूप से जारी किया जाएगा तथा इस विषय पर कार्य परिषद की बैठक यथाशीघ्र आहूत की जाएगी, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। श्री पैकरा ने आश्वस्त किया कि कार्य परिषद सदस्य के रूप में वे इस प्रकरण को उसके तार्किक परिणाम तक ले जाने हेतु प्रतिबद्ध हैं तथा विश्वविद्यालय की गरिमा, परिसर की शांति एवं जनजातीय विद्यार्थियों के शैक्षणिक भविष्य की रक्षा हेतु हर संवैधानिक मंच पर अपनी बात रखेंगे।

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