जबलपुर। गौरीघाट स्थित साकेत धाम में दिनांक 5 अगस्त से 11 अगस्त तक श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय (सांख्य योग) पर आयोजित प्रवचन सत्र में शाम 5:30 बजे से 6:30 तक परमहंस स्वामी गिरिशानन्द सरस्वती जी के मुखारविंद से बृहद विश्लेषण किया गया।
महाराज श्री ने ‘स्थितप्रज्ञ’ (यानी स्थिर बुद्धि वाले, आत्मज्ञानी) पुरुष के लक्षणों का बहुत ही सुंदर और गहन विश्लेषण किया। जब अर्जुन ने भगवान से पूछा था कि “स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य के क्या लक्षण हैं और वह कैसे बोलता, बैठता और चलता है?
महाराज जी ने बताया कि जब जीवन में दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में किसी प्रकार की घबराहट, बेचैनी या शोक नहीं होता। अनुकूल परिस्थितियों की प्राप्ति होने पर जो सर्वथा निःस्पृह रहता है जिसके मोह भय और क्रोध पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। समुद्र में हजारों नदियाँ मिलती हैं लेकिन समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता।
वैसा ही संतुलित और मननशील व्यक्ति स्थितप्रज्ञ है।
महाराज श्री ने कहा कि सामान्य मनुष्य का मन सुख मिलने पर बहुत अधिक प्रसन्न (उत्साहित) हो जाता है और दुःख मिलने पर विचलित या निराश हो जाता है। इसके विपरीत, स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति जानता है कि सुख और दुःख दोनों चक्र की तरह घूमते रहते हैं। वह दुखों से घबराता नहीं और न ही सुखों के पीछे पागलों की तरह भागता है।
महाराज जी ने बताया कि राग, भय और क्रोध ये मनुष्य पतन के तीन मुख्य द्वार हैं— किसी वस्तु से अत्यधिक मोह (राग) होना, उसे खोने का डर (भय) पैदा होना, और जब वह न मिले तो गुस्सा (क्रोध) आना। इन तीनों विकारों पर विजय पाने वाला ही सच्चा ज्ञानी है। आंतरिक शांति और स्थिरता बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। जीवन में लगातार अच्छे और बुरे अनुभव लाभ-हानि, मान-अपमान, सफलता- असफलता आते रहते हैं। एक साधारण व्यक्ति अच्छी खबर पाकर झूम उठता है और बुरी खबर पाकर टूट जाता है।
महाराज श्री का पूजन सर्व श्री भगवान दास धीरावाणी, रवि शोरेवाल, संदीप जैन जेडीए अध्यक्ष, विवेक पाठक, दिलीप चतुर्वेदी, एस के चौरसिया, पंकज अग्रवाल, अलभ्य बाजपेयी, मनीष दुबे, बालकृष्ण अग्रवाल, नलिन पांडेय, दीपा शोरेवाल, मनीष गुप्ता, रमेश नवेरिया आदि ने किया। पूजन पंडित रोहित दुबे, पंडित सौरभ दुबे ने सम्पन्न कराया।


