जबलपुर। गौरीघाट स्थित साकेत धाम में 5 अगस्त से 11 अगस्त तक आयोजित श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय ‘सांख्य योग’ पर आधारित प्रवचन श्रृंखला के दूसरे दिन शाम 5:30 बजे से 6:30 बजे तक परमहंस स्वामी गिरिशानन्द सरस्वती जी ने श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का प्रारंभ ज्ञान से नहीं, बल्कि विषाद से कराया, क्योंकि जब तक मनुष्य अपने अहंकार का त्याग नहीं करता, तब तक वह सच्चे ज्ञान को ग्रहण नहीं कर सकता।
स्वामी जी ने कहा कि जब जीवन में सब कुछ अनुकूल होता है, तब मनुष्य भगवान को भूल जाता है। लेकिन जब संकट, बीमारी, आर्थिक कठिनाइयाँ, पारिवारिक समस्याएँ या संबंधों में टूटन आती है, तब हर व्यक्ति अर्जुन की स्थिति में पहुँच जाता है। उन्होंने बताया कि कुरुक्षेत्र में अर्जुन के हाथ से गांडीव छूट गया था, शरीर कांपने लगा था और आँखों में आँसू थे। यही स्थिति आज के मनुष्य की भी है, जो जीवन के अलग-अलग संघर्षों से जूझ रहा है।
उन्होंने कहा कि गीता केवल कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि की पुस्तक नहीं, बल्कि जीवन के हर संघर्ष में मार्गदर्शन देने वाला दिव्य ग्रंथ है। जिस प्रकार खाली पात्र में ही जल भरा जा सकता है, उसी प्रकार अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
स्वामी गिरिशानन्द सरस्वती जी ने कहा कि यदि जीवन में कभी ऐसा समय आया हो जब मनुष्य ने कहा हो कि “अब मेरी बुद्धि काम नहीं कर रही, अब भगवान ही मार्ग दिखाएँ”, तो समझिए भगवान उसे गीता का संदेश देने वाले हैं। उन्होंने कहा कि नौकरी छूटने, व्यापार में नुकसान या संबंध टूटने जैसी परिस्थितियों से टूटना नहीं चाहिए, क्योंकि गीता सिखाती है कि परिस्थितियाँ बदलती हैं, आत्मा नहीं।
प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि मनुष्य का अधिकांश दुःख वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों के प्रति अत्यधिक आसक्ति से उत्पन्न होता है। जो स्वयं को पहचान लेता है, वही जीवन में स्थिर और शांत रह सकता है।
इस अवसर पर भगवान दास धीरावाणी, दीपा रवि शोरेवाल, विवेक पाठक, दिलीप चतुर्वेदी, अमन दुबे, यश व्यास, एस.के. चौरसिया, मनीष दुबे, बालकृष्ण अग्रवाल, वैभव द्विवेदी, नलिन पांडेय, मनीष गुप्ता, महेंद्र पांडेय, विराट शर्मा, हर्ष गौतम, रमेश नवेरिया सहित अनेक श्रद्धालुओं ने महाराज श्री का पूजन किया। पूजन पंडित रोहित दुबे एवं पंडित सौरभ दुबे ने संपन्न कराया।


